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वरुण को श्रेष्ठ बताने वाले ऋषियों ने जबाव दिया- जल के बिना शुद्धता की कल्पना नहीं हो सकती. यज्ञआदि कार्य करने से पहले स्नान जरूरी है, अन्यथा देवता उसे ग्रहण नहीं करते. तो यदि जल ही न हुआ तो स्नान न होगा और स्नान न हुआ तो यज्ञ का क्या मतलब?
अग्नि समर्थकों ने फिर तर्क दिया- जीवन को अग्नि ही आधार देते हैं क्योंकि मनुष्यों का भरण-पोषण करने वाले देवों का पोषण अग्नि के माध्यम से होता है. अग्नि मनुष्यों में शुक्र के रूप में स्थित होते हैं जो स्त्री के साथ संयोग से संतान का रूप लेता है.
वरुण का पक्ष लेने वालों ने इसके उत्तर में कहा- मनुष्यों को जीने के लिए भोजन अवश्य चाहिए. जल के बिना पेड़-पौधे और अन्न हो नहीं सकते. इसलिए अगर मनुष्य जीवित ही नहीं रहा तो वह संतान उत्पन्न कैसे करेगा? अमृत का आधार तत्व भी जल है न कि अग्नि.
विवाद बढ़ता गया. कोई पक्ष झुकने को तैयार न था. सभी इंद्र के पास निर्णय के लिए गए. इंद्र को लगा एक को श्रेष्ठ बताने का अर्थ है दूसरे से बैर. उन्होंने जान छुड़ाने के लिए कहा- सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के अलावा इसका निर्णय दूसरा कोई नहीं कर सकता.
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