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सभा सजी थी और राजा आमोद में डूबा था. तभी धर्मवत्स को देख वह सब कुछ त्यागकर अपने दिव्य सिंहासन से उठ खड़ा हुआ. राजा व्यग्रता से धर्मवत्स की ओर बढा. राजा ने धर्मवत्स का स्वागत पैर छूकर किया और आसन दिया.

राजा ने कहा- हे ब्राह्मणदेव आप जैसे विष्णुभक्त के दर्शन से मेरा कुल पवित्र हो गया. राजा ने उन चारों युवकों को आदेश देते हुए कहा कि ब्राह्मण श्रेष्ठ को इनकी दक्षिणा समेत जहां से लाये थे वही जस का तस छोड़ आओ.

धर्मवत्स ने राजा से अपनी जिज्ञासा व्यक्त की और कहा- पहले मुझे यह बताएं कि मुझे यहां क्यों लाया गया, आप कौन हैं? मेरी पूजा आपने क्यों की और फिर अब इस तरह वापस क्यों भेज रहे हैं? कृपया उचित उत्तर अवश्य दें.

महाराज ने कहा- हे विप्रवर आप एक अत्यंत श्रेष्ठ ब्राहमण है जो अपने कर्मों के प्रति सचेत और पवित्र हैं साथ ही वृषोत्सर्ग के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं. हमें आपके दर्शन के लाभ लेने थे सो हम आपको यहां लाये. फिर भी इस तरह लाने के लिये क्षमा.

आपने पूछा है कि मैं कौन हूं, तो स्वयं अपने मुख से अपने संबंध में बखान नहीं करूंगा. मेरे यह मंत्री विपश्चित आपको मेरे बारे में बताएंगे हो सकता है इससे आपकी जिज्ञासा शांत हो.

मंत्री विपश्चित ने धर्मवत्स को प्रणामकर कहा- हे श्रेष्ठ बाह्मण, मैं आपको अपने राजा विपश्चित और उनके ऐश्वर्य प्रताप के बारे में बताने से पहले आपको पूर्वजन्म की एक कथा सुनाता हूं.

मंत्री ने क्या कथा सुनाई. उस कथा में ऐसा क्या था जो वशिष्ठजी राजा वीरवाहन को सुनाई जिससे उसका न केवल भय ही मिटा ब्लकि वह स्वर्ग का अधिकारी हुआ. कथा का दूसरा हिस्सा थोड़ी देर में पढें.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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