हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:fb]

वृंदावन पहुंचे तो माताओं का आज अपने बालकों पर स्नेह पहले से ज्यादा उमड़ने लगा. गाएं अपने बछड़ों को एक पल भी अलग नहीं करना चाहतीं. छोटी-छोटी शरारतों पर बालकों के लिए लठ्ठ उठाने वाले पिता बच्चों की शरारतों पर रस लेते.

वृंदावन का तो हाल ही बदल चुका था. कण-कण में प्रेम रस घुला था. वृक्ष लताएं स्वयं झुकने लगतीं कि कोई बछड़ा उन्हें खा ले. इस तरह एक वर्ष का समय बीत गया. एक दिन श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ बछड़ों को चराते वन में गए.

उसी समय ब्रह्माजी बह्मलोक से वृंदावन में लौट आए. इस बीच ब्रह्मा की अवधि का केवल एक त्रुटि यानी सूई से कमल के पत्ते में छेद करने में लगने वाला समय व्यतीत हुआ था. किंतु पृथ्वी पर तो एक वर्ष में कुछ दिन ही शेष थे.

ब्रह्माजी ने देखा कि जिन बछड़ों तथा बाल-ग्वालों को उन्होंने हरके छुपा दिया वे सब तो जस के तस गोकुल में उपस्थित हैं. ब्रह्माजी चक्कर में पड़े कि कहीं ऐसा तो नहीं श्रीहरि ने अपनी माया से उन्हें वापस ले लिया.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here