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भागवत कथाः अंगिरा मुनियों के शाप से सुदर्शन बना अजगर, श्रीकृष्ण के चरणों के स्पर्श से हुआ उद्धार

भागवत कथाः अंगिरा मुनियों के शाप से सुदर्शन बना अजगर, श्रीकृष्ण के चरणों के स्पर्श से हुआ उद्धार

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शिवरात्रि आई तो नंदबाबा आदि सभी गोपों ने मिलकर शिवजी की विशेष पूजा-अर्चना का निश्चय किया. सभी ने अपनी-अपनी बैलगाड़ी सजाई और पूरी तैयारी करके अंबिका वन की ओर चले.

सरस्वती नदी में स्नान के बाद भगवान भोलेनाथ और माता भवानी की भक्तिपूर्ण पूजा की. गौएं, सोना, वस्त्र आदि दान किया और निर्धनों को भोजन कराया. गोपों ने तो महाशिवरात्रि व्रत रखा था इसलिए रात्रि जागरण करने लगे.

ग्वाल बालक सरस्वती के तट पर ही सो गए. अंबिकावन में एक बहुत विशाल अजगर रहता था. उसके भय से कोई अंबिकावन में आता नहीं था. आसपास के सभी जीवों को वह चट कर चुका था.

लंबे समय से भूखा अजगर दैवयोग से उधर पहुंच गया. उसने एक साथ इतने मानव देखे तो प्रसन्न हो गया. अजगर ने नदी किनारे विश्राम कर रहे नंदबाबा को पकड़ लिया और निगलने लगा.

नंदबाबा प्राण रक्षा के लिए चिल्लाए. सभी गोप लाठी-डंडे और जलती लकड़ियां लेकर दौड़े. उन्होंने अजगर पर प्रहार करना शुरू कर दिया लेकिन अजगर तो उन्हें निगलता ही जा रहा था. हाहाकार मच गया चारों तरफ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
श्रीकृष्ण ने भी चीख-पुकार सुनी तो भागे आए. वह लपककर अजगर के पास पहुंचे और उसे एक लात लगाई. उनके पैरों के स्पर्श से ही अजगर ने नंदबाबा को छोड़ दिया और तत्काल रूप बदल लिया.

पलभर में अजगर के स्थान पर एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी पुरुष खड़ा था जिसने भगवान श्रीकृष्ण की भक्तिभाव से भरकर वंदना की. सब यह चमत्कार आश्चर्य में भरे देखते रहे.

भगवान ने उस पुरुष से पूछा- तुम कौन हो? भयानक शरीर वाली अजगर की निंदनीय योनि तुम्हें क्यों प्राप्त हुई थी? सबको यह बताओ, सभी जानने को इच्छुक हैं.

अजगर से मानव बना युवक बोला- भगवन आप तो जानते ही हैं, आपसे क्या छुपा. परंतु जो लोग नहीं जानते हैं उनका कौतूहल दूर करने के लिए मैं अपने पूर्वजन्म का प्रसंग कहता हूं.

मैं सुदर्शन नामका विद्याधर था. प्रभु के आशीर्वाद से विद्या और सौंदर्य से परिपूर्ण और विलक्ष्ण था. फिर मैंने उस विद्या के बल से धन भी प्रचुर अर्जित कर लिया. इससे मुझमें कुछ घमंड आ गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
धन, विद्या और सौंदर्य के अभिमान में चूर मैं अपने विमान में बैठकर विचरण किया करता था. एक दिन मेरी नजर अंगिरा गोत्र के कुछ कुरूप मुनियों पर पड़ी. रूप के गर्व मैं मैंने उनका बड़ा अपमान कर दिया.

ऋषियों ने मुझे समझाया कि किसी के रूप का उपहास नहीं करना चाहिए किंतु मद में चूर होकर मेरा विवेक शून्य हो गया था. मैं अपनी आदत से बाज नहीं आया और उनका माखौल करता रहा.

क्रोधित होकर मुनियों ने मुझे शाप दे दिया कि तुम संसार भरमें घूमकर अपने रूप पर इतराते हो इसलिए तुम निंदनीय रूप वाले अजगर योनि में चले जाओ और घूमने-फिरने का सामर्थ्य क्षीण हो जाए. तब से मैं शापित होकर यहां पड़ा था.

आपके स्पर्शमात्र से मेरा शाप छूट गया. ऐसा प्रतीत होता है कि उनका शाप मेरे लिए वरदान में परिवर्तित हो गया. प्रभु मैं अब आपकी शरण में हूं, मेरा उद्धार कीजिए. मैं अपने लोक जाने की अनुमति चाहता हूं.

प्रभु का संकेत पाते ही विद्याधर सुदर्शन ने उनकी प्रदक्षिणा की और उचित प्रकार से स्तुति करने के बाद अपने लोक को चला गया. ब्रजवासियों ने प्रभु का यह प्रभाव देख तो उनका गुणगान करते व्रज की ओर चल पड़े.

संपादनः प्रभु शरणम्

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