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भगवान जगन्नाथजी की रथयात्रा की अद्भुत और रोमांचक बातेंः

जगन्नाथजी, भाई बलभद्रजी और बहन सुभद्रा अलग-अलग रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं.

भगवान जगन्नाथ नंदिघोष रथ पर, बलभद्रजी तालध्वज और सुभद्राजी देवदलन नामक रथ पर सवार होंगी.

भगवान की रथयात्रा में सबसे आगे लाल-हरे रंग का बलभद्रजी का रथ, बीच में काले-नीले-लाल रंग का सुभद्राजी का रथ होगा. सबसे पीछे लाल और पीले रंगों से सजा होगा भगवान जगन्नाथ का रथ- नंदीघोष.

इन रथों में कहीं भी लोहे के कीलों या पेंच का प्रयोग नहीं होता. सभी रथ नीम की पवित्र लकड़ियों से बनाते हैं. इससे ‘दारु’ के नाम से जाना जाता है.

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रथों के लिए लकड़ी ढूंढने का काम एक जटिल प्रक्रिया है. यह बसंत पंचमी से शुरू होती है. रथ निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होता है.

रथनिर्माण पूरा होने पर एक विशेष पूजा होती है जिसे ‘छर पहनरा’ कहते हैं. पुरी के राजा पालकी में आकर तीनों रथों की पूजा करते हैं. फिर ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मण्डप और रास्ते की सफाई करेंगे. राजा इंद्रद्युम्न ने ऐसा किया था.

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आषाढ़ शुक्लपक्ष की द्वितीया को रथयात्रा शुरू होगी. फिर ये गुंडीचा मंदिर पहुंचेगी. गुंडीचा राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी थीं. (पढ़ें जगन्नाथ रथयात्रा की पूरी कथा) इसे ही भगवान की मौसी रोहिणीजी का घर माना जाता है. यहां भक्‍तों को भगवान के दर्शन देंगे. इसे ‘आड़प-दर्शन’ कहा जाता है.

रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी को लक्ष्मीजी, भगवान को ढूंढती यहीं आती हैं. द्वैतापति दरवाज़ा बंद कर देंगे तो रुष्ट लक्ष्मीजी रथ का पहिया तोड़ देंगी.
रूष्ट लक्ष्मीजी ‘हेरा गोहिरी साही पुरी’ लक्ष्मी मंदिर में चली जाएगी. भगवान जगन्नाथ उन्‍हें वहां मनाने पहुंचेंगे.

आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुन: मुख्य मंदिर की ओर वापस चलेंगे. वापसी यात्रा बहुड़ा यात्रा कहलाती है.

मंदिर वापस पहुंचने पर भी सभी प्रतिमाएं रथ में ही रहती हैं. एकादशी को द्वार खोले जाते हैं. विधिवत स्नान करवाकर मंत्रोच्चार के साथ उन्‍हें पुन प्रतिष्ठित किया जाता है. इस तरह भगवान की मनुष्य लीला पूर्ण होती है.

भगवान जगन्नाथजी के मंदिर में होते हैं अनेक चमत्कार. अगले पेज पर पढ़ें..

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