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जब ऋषि ने यह अनर्थ देखा और अपने संपूर्ण श्रम से ज्यादा मानव जाति की समाप्ति की समस्या के समाधान पर पानी फिरता देखा तो उन्हें कौवे पर अत्यंत क्रोध उमड़ आया.

क्रोध से भरे अगस्त्य कौवे को उसके किए का दंड देने ही वाले थे कि अचानक कौए ने रूप बदला और गणेशजी प्रकट हो गए. अब नतमस्तक होने की बारी ऋषि की थी. गणेशजी ने ऋषि से कहा कि मैं आपके परोपकार की भावना से बहुत प्रभावित हूं.

उद्गम स्थल ढूंढने में आप विलंब न करें. इस प्रक्रिया में न तो आपको ज्यादा श्रम लगे न थकान हो और न ही मानव जाति प्रतीक्षारत रहे. इसलिए कौवे का रूप धारण करके आपकी सहायता के लिए मैं स्वयं आया था.

कावेरी के लिए यही उचित उद्गम है. यह कहने के साथ भगवान गणेश अंतर्धान हो गए. उधर कावेरी की कलकल सुन कर ऋषि भी अत्यधिक प्रसन्न हुए. उनकी थकान लुप्त हो गयी.

चूंकि गणेशजी के प्रहार से कमंडल का जल गिरकर पहले एकत्र हुआ और फिर बहा था इसलिए जहां वह जल गिरा था वह तालाब जैसा बन गया. कावेरी वहीं से निकलकर ब्रह्मकपाल पर्वत से प्रवाहित होती है.

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः प्रभु शरणम्

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