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एक बार जम्बूद्वीप के कई क्षेत्रों में ऐसा सूखा पड़ा कि सब कुछ निर्जल हो चला. मनुष्य पशु पक्षी सभी की जान पर बन आई. पानी नहीं होने से सृष्टि पर संकट आ खड़ा हुआ. ऋषि-मुनि और देवता भी दुखी थे.

अनर्थ की आशंका देखकर अगस्त्य ऋषि को बड़ी चिंता हुआ. मानव जाति की रक्षा का प्रण ले वह ब्रह्माजी के पास पहुंचे. अगस्त्य मुनि ने ब्रह्मा जी से कहा- आपसे कुछ छिपा तो नहीं है फिर भी कहता हूं कि पृथ्वी पर त्राहि त्राहि मची हुई है.

अकाल के चलते मानव जाति पर जो संकट आया है वैसा संकट मैंने अभी तक नहीं देखा था. यदि आपने चिंता न की तो जंबूद्वीप का दक्षिण भूभाग तो जन और वनस्पति विहीन हो जाएगा. आपकी रची सृष्टि पर संकट भारी है.

ब्रह्माजी ने कहा- मैं सब समझता हूं. इस सृष्टि की रक्षा के लिए तुम्हारी चिंता से मुझे बहुत प्रसन्नता भी हो रही है लेकिन इस संकट के समाधान का मार्ग बहुत कठिन है. यदि कोई कर सके तो मैं निदान बता सकता हूं.

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