गीता ज्ञानामृत अध्याय एकः श्लोक संख्या-7 (दुर्योधन द्वारा द्रोणाचार्य से कौरव सेना का वर्णन)

गीता ज्ञानामृत अध्याय एकः श्लोक संख्या-7 (दुर्योधन द्वारा द्रोणाचार्य से कौरव सेना का वर्णन)

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”।।

हम गीता-ज्ञान के अंतर्गत प्रथम अध्याय में दुर्योधन-द्रोण संवाद का वर्णन कर रहे हैं। कल हमने श्रीमद्भगवद्गीता के पञ्चम् एव षष्ठम् श्लोक की व्याख्या की।

आज  के गीता ज्ञानामृत में सातवें श्लोक  की चर्चाः

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते। ।7।

श्लोकार्थ-
दुर्योधन कहता है कि हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हमारे पक्ष में भी जो जो प्रधान योद्धा हैं उन्हें आप समझ लीजिए। मेरी सेना में जो सेनानायक हैं, मैं उनकी क्षमताओं के बारे में आपसे कहता हूूं।

व्याख्या-
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र युद्धक्षेत्र में बदल गया है।कौरवों और पाण्डवों की सेना आमने सामने है।संसार के समस्त महारथी किसी न किसी पक्ष से युद्ध के लिए तैयार हैं।धर्म व अधर्म के बीच द्वंद्व हो रहा है।

दुर्योधन गुरु द्रोण से पाण्डवों की सेना का विश्लेषण कर चुका है।

अब वह एक कुशल नायक के समान अपने पक्ष में उपस्थित महारथियों के रणकौशल का वर्णन कर रहा है। युद्ध कौशल के अंतर्गत दोनों पक्ष के विषय में जानना बहुत आवश्यक होता है।

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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