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असुरों से अपनी संतान की रक्षा के लिए देवमाता अदिति ने सूर्य को दिया पुत्ररूप में जन्मः आदित्य के जन्म की प्रचलित कथा

असुरों से अपनी संतान की रक्षा के लिए देवमाता अदिति ने सूर्य को दिया पुत्ररूप में जन्मः आदित्य के जन्म की प्रचलित कथा

surya dev
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कई लोगों ने भगवान सूर्य के आदित्य बनने की कथा सुनाने की पहले कई बार मांग की. रविवार सूर्यदेव का दिवस है. पढ़ें आदित्य अवतार की कथा.

दिति के पुत्र दैत्यों और अदिति के पुत्र देवताओं में घोर शत्रुता थी. दैत्य अपना वर्चस्व सिद्ध करने के लिए हमेशा देवों पर आक्रमण करते थे इसलिए दोनों पक्ष हमेशा युद्धरत रहते थे.

सौतेले भाइयों दैत्यों और देवताओं के बीच एक बार महासंग्राम अनगिनत वर्षों तक चला. इसमें देवताओं को बड़ी क्षति हई. दैत्यों ने देवों को पराजित कर दिया.

वे पराजित होकर जान बचाकर वन-वन भटकने लगे. देवताओं की दुर्दशा देखकर उनके पिता महर्षि कश्यप और माता अदिति दुःखी रहने लगे. देवर्षि नारद घूमते-घूमते कश्यपजी के आश्रम की ओर आ निकले.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अदिति और कश्यप को व्याकुल देखकर उन्होंने चिंता का कारण पूछा. अदिति बोलीं-“देवर्षि! दैत्यों ने युद्ध में मेरे पुत्रों को पराजित कर दिया है. इन्द्र और अऩ्य देवता वन-वन भटक रहे हैं. उनकी रक्षा करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा.

अदिति का कथन सुनकर नारदजी बोले- माता अभी केवल, सूर्य ही शक्ति ही अक्षुण्ण रह गई है. इस संकट से बचने का मुझे तो केवल एक ही रास्ता नजर आता है. आप उपासना करके भगवान सूर्य को प्रसन्न करें और उनसे पुत्र रूप में प्रकट होने का वर मांग लें.

सूर्यदेव के तेज से ही दैत्य पराजित हो सकते हैं. वह देवों के भाई हो जाएंगे. अपने भाइयों की रक्षा करना और उनका खोया हुआ सम्मान दिलाना उनका दायित्व हो जाएगा. अदिति को सूर्य की तपस्या के लिए प्रेरित कर नारद चले गए.

अपनी संतान के कल्याण के लिए अदिति कठोर तप करने लगीं. अनगनित वर्षों के तप के पश्चात भगवान सूर्यदेव साक्षात प्रकट हुए और अदिति से मनोवांछित वरदान मांगने को कहा.

अदिति ने भगवान सूर्य की स्तुति की और उनसे विनती की कि वह पुत्र के रूप में उनके घर में जन्म लेकर अपने सहोदर भाइयों की रक्षा करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अदिति को वरदान देकर सूर्य अंतर्धान हो गए और उनसे कहा कि जल्द ही वह उनके गर्भ से अवतार लेंगे. समय आने पर सूर्य का तेज अदिति के गर्भ में स्थापित हो गया.

एक दिन कश्यप और अदिति साथ में ही आश्रम में बैठे थे. किसी विषय पर चर्चा चल रही थी. अचानक ही कश्यप किसी बात को लेकर अदिति पर क्रुद्ध हो गए. क्रोधित कश्यप ने अदिति के गर्भस्थ शिशु के लिए ‘मृत’ शब्द का प्रयोग कर दिया.

कश्यप के ‘मृत’ शब्द का उच्चारण करते ही अदिति के शरीर से एक दिव्य प्रकाश पुंज निकला. उस प्रकाश पुंज को देखकर कश्यप मुनि भयभीत हो गए. उन्हें अपने शब्दों पर पश्चाताप होने लगा और वह सूर्यदेव से अपने अपराध की क्षमा मांगने लगे.

तभी आकाशवाणी हुई- मुनिवर! मैं तुम्हारे अपराध क्षमा करता हूं. तुम इस पुंज की उपासना करो. उचित समय पर इससे एक दिव्य बालक जन्म लेगा और तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने के बाद ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित हो जाएगा.

महर्षि कश्यप और अदिति ने वेद मंत्रों द्वारा प्रकाश पुंज की स्तुति आरंभ कर दी. उचित समय आने पर उसमें से एक तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसके शरीर से दिव्य तेज निकल रहा था. यही बालक आदित्य और मार्तण्ड आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ. आदित्य वन-वन जाकर देवताओं को एकत्रित करने लगा.

आदित्य के तेजस्वी और बलशाली स्वरूप को देख इन्द्र आदि देवता अत्यंत प्रसन्न हुए. उन्होंने आदित्य को अपना सेनापति नियुक्त कर दैत्यों पर आक्रमण कर दिया.

आदित्य के तेज के समक्ष दैत्य नहीं टिक पाए और शीघ्र ही उनके पैर उखड़ गए. अपनी जान बचाने के लिए वे भागकर पाताल लोक में छिप गए.

सूर्यदेव के आशीर्वाद से स्वर्ग लोक पर फिर से देवताओं का अधिकार हो गया. सभी देवताओं ने आदित्य को जगत पालक और ग्रहों के अधिपति के रूप में स्वीकार किया.

सृष्टि को दैत्यों के अत्याचारों से मुक्तकर आदित्य भगवान सूर्य के रूप में ब्रह्माण्ड के मध्य भाग में स्थित हो गए और वहीं से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कार्य-संचालन करने लगे.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम्

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