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हरिमित्र ने उल्लू को डांट कर पूछा कि तुम राजा भुवनेश का शव कैसे खाने जा रहे थे. उल्लू फूट-फूट कर रोने लगा. उसने सारी कहानी बताई. तुम्हारी दुर्गति करने से मेरा यह हाल हुआ. मेरे सारे पुण्य बर्बाद हो गये. अब अपना ही शरीर खाने को मजबूर हूं.

हरिमित्र बड़े दयालु थे. बोले- मैंने तुम्हें हर तरह से माफ किया. यह सब नरक अब तुम्हें नहीं भोगना होगा और कुत्ता भी न बनोगे. अपने प्रसाद से मैं तुम्हें गानयोग देता हूं अब तुम गा-गाकर भगवान विष्णु को प्रसन्न करो.

हरिमित्र के ऐसा कहकर जाने के बाद ही सब कुछ बदल गया. सारे नरक समाप्त हो गए. राजा भुवनेश्वर को गान योग मिल गया था जिसकी सहायता से वे भगवान विष्णु की स्तुति कर विष्णुलोक को प्राप्त हुए. (स्रोत: लिंग पुराण)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव

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