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जामवंतजी द्वारा अपनी शक्तियों का स्मरण कराए जाने के बाद हनुमानजी सभी वीरों के साथ अभिवादन का आदान-प्रदान करके प्रभु श्रीराम का नाम लेकर रामकाज के लिए समुद्र लांघने के उड़ चले.

उन्हें पवन वेग से लंका की ओर बढ़ता देख देवताओं ने सोचा कि यह रावण जैसे बलशाली की नगरी में जा रहे हैं. रावण शक्तिशाली होने के साथ-साथ बड़ा मायावी भी है.

वहां शक्ति के साथ बुद्धि कौशल की भी आवश्यकता होगी इसलिए हनुमानजी बल-बुद्धि की विशेष परीक्षा करनी आवश्यक है.

देवगण समुद्र में निवास करने वाली नागों की माता सुरसा के पास गए. सुरसा उनकी भी माता जैसी ही थीं कि नाग और देवगण कश्यप की ही संतान हैं.

उन्होंने माता सुरसा से विनती कि आप बजरंग बली के बल-बुद्धि की परीक्षा लें. सुरसा ने रामकाज में अपना योगदान देने के लिए इसे सहर्ष स्वीकार लिया.

वह हनुमानजी की परीक्षा लेने के लिए चल पड़ी. उन्होंने राक्षसी का रूप धारण किया और हनुमानजी के सामने जा खड़ी हुई.

सुरसा ने हनुमानजी से कहा- सागर के इस भाग से जो भी जीव गुजरे मैं उसे खा सकती हूं. देवताओं ने मेरे आहार की ऐसी ही व्यवस्था की है.

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