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मार्कंण्डेयजी ने कहा- हे सहस्रणीक. जब हिरण्यकश्यप पत्नी को यह विवरण सुना रहा था तब उसका प्रेम परिणिति के समीप था. दैवयोग से वह स्वयं ऊं नमो नारायण, ऊं नमो नारायण को जपते हुए ही स्खलित हुआ.

तो सहस्रणीक इस प्रसंग के बाद जब कयाधु गर्भवती हुई तो उससे जो बालक पैदा हुआ वह जन्मजात नारायण का अन्नय भक्त हुआ क्योंकि उसके बीज पड़ते समय उसके पिता ने अंजाने में ही नारायण नाम लिया था.

सह्स्त्रणीक यह नारायण की ही लीला थी कि संसार के सबसे बड़े नारायण द्रोही के घर में सबसे बड़े नारायण भक्त का जन्म हुआ. दैत्यराज होकर भी वह मलिन कर्मों से दूर निर्मल भाव से रहता हुआ महान विष्णु भक्त प्रह्लाद बना.

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