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हिरण्यकश्यपु के सेवकों ने कहा- इस तप का कोई अर्थ नहीं है स्वामी क्योंकि तप तो उनके लिए है जिनकी कोई आकांक्षा पूर्ण न हुई हो. आपके आगे तो सभी नतमस्तक हैं.
हिरण्यकश्यप में अहंकार बहुत था. उसने किसी की न मानी.
आपने बंधु बांधवों की बात ठुकरा कर दो-तीन मित्रों के साथ लेकर फिर से तप करने को चला गया. वह कैलाश के शिखर पर पहुंचा और तपस्या आरंभ कर दी.
तप के कुछ ही बरस बीते होंगे कि स्वयं ब्रह्माजी भी अत्यंत चिंतित हो उठे. उन्होंने सोचा कि यह दैत्य यदि इसी तरह दुष्कर तपस्या करता रहा तो सभी देवता इसके अधीन हो जाएंगे. फिर यह दुर्बुद्धि उन सबकी शक्तियों का नाजायज प्रयोग करेगा.
अपनी बनाई सृष्टि की व्यवस्था पर ब्रह्माजी को संकट घिरता दिख रहा था.
उन्हें चिंता हुई कि कैसे हिरण्यकश्यपु को इस कठिन तप से अलग किया जाए. वह इसी चिंता में व्याकुल थे तभी उन्हीं देवर्षि नारद दिखे.
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