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भगवान ने भिक्षु को बुलवाया और उससे पूछा कि बिना बात उसने कुत्ते को लाठी क्यों मारी?

भिक्षु बोला- मैं भिक्षाटन के लिए जा रहा था. यह कुत्ता कई बार रास्ते में आ गया. भूख से व्याकुल होने के कारण मेरा दिमाग स्थिर न था. मुझसे अपराध तो हुआ है. आप जो चाहें दंड दें, मुझे स्वीकार है.

भिक्षु की बात सुनकर श्रीराम ने सभासदों से उसके लिए दंड तय करने को कहा.

सभी मंत्रीगणों की राय थी कि भिक्षु तो दंड से परे होता है इसलिए हमारा दंड तय करना उचित न होगा. पर कुत्ता यदि चाहता है कि इसे दंडित किया जाए तो दंड का निर्धारण पीड़ित कुत्ता स्वयं ही तय करे.

भगवान ने कुत्ते से पूछा तो वह इस बात के लिए सहमत दिखा. उसने कहा- प्रभु यदि आप चाहते हैं कि मैं दंड तय करूं तो फिर इस भिक्षु को कालंजर मठ का मठाधीश बना दीजिए.

इस दंड की बात सुनकर सभी को घोर आश्चर्य हुआ. एक भिक्षु को मठ का अधिपति बना देना यह कैसा दंड है. शायद दिमाग पर चोट लगने से कुत्ते की मति फिर गई है.

श्रीराम ने भिक्षु को कालंजर का कुलपति नियुक्त करके सम्मानपूर्वक मठ में भेज दिया. सभासद अपना कौतूहल रोक नहीं पा रहे थे. उन्होंने आखिरकार पूछ ही लिया कि क्या सचमुच यह दंड है?

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