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काशी में ऐसा अनर्थ! पंडों ने कबीर को घेरा और पूछा- तू रामनाम रटता है, तुझे रामनाम की दीक्षा किसने दी?

कबीर बोल पड़े- स्वामी रामानंदजी महाराज के श्रीमुख से मुझे रामनाम की दीक्षा मिली. इसलिए गुरू के दिए मंत्र और गुरू का नाम रटता रहता हूं.

स्वयं महंथ जी ने दी एक यवन को रामनाम की दीक्षा, किसी को भरोसा न हुआ.

अगला प्रश्न आया कबीरदासजी से- ये बता कहाँ ली तुमने यह दीक्षा और कब ली?

कबीर ने सारी कथा बताने की जरूर न समझी. बस थोडे में कह दिया- गंगा के घाट पर ली थी गुरूजी से दीक्षा. तब से गुरूमंत्र रट रहा हूं.

पंडे पहुँचे रामानंदजी के पास और शिकायत की- आपने यवन को राममंत्र की दीक्षा देकर मंत्र को भ्रष्ट कर दिया, सम्प्रदाय को भ्रष्ट कर दिया. गुरु महाराज! यह आपने क्या अनर्थ किया? आप जैसे पहुंचे हुए संत विद्वान के लिए यह उचित नहीं है. यह तो अनर्थ ही हो गया. अब न जाने क्या होगा आगे.

महाराजजी ने सुना तो उन्हें सहसा विश्वास न हुआ. फिर बोले कहा- अरे मैंने तो किसी यवन को दीक्षा नहीं दी. क्या मिथ्या भाषण कर रहे हो.

पंडों ने कहा- महाराजा वह मुस्लिम जुलाहा तो दिन-रात रामानंद….. रामानंद….. मेरे गुरुदेव रामानंद…’ की रट लगाकर नाचता है. रामनाम का मंत्र रटता है. पूछने पर कहता है आपसे दीक्षित हुआ है. आपका नाम बदनाम करता है.

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