तीसरा भाग… पिछली कथा से आगे

कानभूति के कहने पर वररुचि ने अपने बारे में बताना शुरू किया. वररुचि ने बताया- मैं कौशांबी नगर में रहने वाले ब्राह्मण सोमदत्त के वहां पैदा हुआ. मेरी माता का नाम वसुदत्ता था.

मेरी माता थी तो ऋषि पुत्री परंतु श्राप के चलते उसका विवाह मेरे पिता के साथ हुआ था. बचपन में ही मेरे पिता का देहांत हो गया था सो मुझे पालपोस कर मां ने ही बड़ा किया था.

एक बार मेरे घर दो यात्री आए. दोनों विद्वान थे. रास्ते में शाम हो गयी सो उन्हें आज की रात मेरे घर ही काटनी थी. देर शाम को पास से ही मृदंग की आवाज सुनायी पड़ी तो मां को पिता की याद हो आयी.

मां बोली- लगता है भवानंद नाच रहा है. वह तेरे पिता का पक्का दोस्त था. मैंने मां से बोला मैं बस अभी जाता हूं और भवानंदजी का नृत्य देख कर तुरंत आता हूं फिर तुम्हारे सामने हूबहू कर के दिखाउंगा.

अतिथि ब्राह्मणों ने मेरी मां से पूछा- क्या यह ऐसा कर सकेगा? मां ने कहा कि मेरा बेटा जो एक बार देख सुन लेता है वह चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो याद कर लेता है.

ब्राह्मणों को भरोसा न हुआ तो उन्होंने वेद का एक बहुत कठिन भाष्य बोला. मैंने तुरंत पलट कर उन्हें वैसे ही सुना दिया. वे चकित. कुछ सोच कर बोले, हम भी तुम्हारे साथ भवानंद का खेला देखेंगे.

मैं उन दोनों के साथ गया और लौट कर जैसे का तैसा करके और सुनाकर मां को सब बता दिया. मेरी याददाश्त देखकर वह भौंचक रह गए. उनमें से एक का नाम व्याडि था.

व्याडि मां से बोले- आप धन्य हैं. आपका बालक तो शृतिधर यानी जो सुना देखा उसे दिमाग में हूबहू उतार लेने वाला. हम तो इसी की खोज में थे. भगवान की कृपा से हमारी खोज पूरी हुई, यह हमें मिल गया.

मेरी मां ने कहा- मेरा पुत्र अनूठी प्रतिभा वाला है यह तो ठीक है पर आप दोनों इसे ही क्यों खोज रहे थे? इस बात में क्या रहस्य है, कृपया यह बतायें.

व्याडि बोले- यह मेरा मित्र इंद्रदत्त है. जब हमारे मां पिता स्वर्गवासी हुए तो हमने विशेष विद्या प्राप्ति के लिये स्वामी कार्तिक की कठिन तपस्या की. हमारी तपस्या से कार्तिक स्वामी प्रसन्न हुए.

सपने में आकर कार्तिक स्वामी ने हमसे कहा- तुम दोनों को पाटिलीपुत्र में वर्ष नामक ब्राह्मण मिलेगा वही तुम्हें ज्ञान देगा. हम दोनों वर्ष नाम के ब्राह्मण की खोज में लग गये.

आखिरकार हमने वर्ष नामक ब्राह्मण को ढूंढ निकाला पर यह तो मूर्ख निकला. दिन भर चुपचाप, बिन बोले बैठा रहता. हम तो लौटने ही वाले थे कि उसकी पत्नी ने एक बात बताकर हमारे लिए रास्ते खोल दिए. उसने बताया-

मेरे पति कभी महामूर्ख थे पर अब परम ज्ञानी हैं. कार्तिक स्वामी की कृपा से उन्हें ज्ञान मिला है. पर कठिनाई यही है कि कोई सुकृत शृतिधर यानी जिसे एक ही बार में सब याद हो जाये वही इनसे विद्या सीख सकता है, और कोई नहीं.

अब हमें कोई ऐसा शृतिधर चाहिये जो एक बार ज्ञान को सुनकर तुरंत याद कर ले और फिर हमें बताए. हम दो चार बार दुहरा कर उसे याद कर लें. इसलिए आप अपने बेटे को हमारे साथ जानें दें.

इस पर मेरी मां ने कहा- जब यह पैदा हुआ था तो आकाशवाणी हुई थी कि यह वर्ष नामक ब्राह्मण से सब विद्या, सारे शास्त्र सीखकर व्याकरण का बड़ा विद्वान बनेगा और संसार इसे वररुचि के नाम से हजारों हजार बरस जानेगी.

आप लोग न आते तो इस बरस मैं इसे वर्ष के पास ले जाने वाली थी. आप के आने से मेरा यह काम सुगम हो गया. आप इसे खुशी के साथ वर्ष के पास ले जाइये.

दोनों ब्राह्मण खूब खुश हुये और अपने पास का सारा धन मेरी मां को दान दे दिया. उस पैसे से मेरी मां ने मेरा जनेऊ कराया और बड़े समारोह और तैयारी के बाद मुझे उनके साथ पाटिलीपुत्र भेजा.

वे मुझे ले कर महाज्ञानी वर्ष के पास गये. वर्ष ने सारी विद्यायें और वेद आदि मुझे सिखा दीं. व्याडि ने इनको दो बार और इंड्रदत्त ने तीन बार रट कर याद कर लिया.

इस पूरे मामले से व्याडि प्रसिद्ध हुये तो वर्ष का नाम चमक उठा. राजा नंद ने उसकी तारीफ सुनी और उसे बुलावा भेजा. बहुत सा धन देकर सम्मानित किया.

वर्ष से प्राप्त विद्यायें और व्याडि तथा इंद्रदत्त को सिखाने में हुए अभ्यास के कारण मेरी भी गणना पाटिलीपुत्र के विद्वानों में होने लगी. मुझे राज नंद ने अपना मंत्री बना लिया.

परिचय जानने के बाद उसने शिवजी की कथा सुनने का अनुरोध किया. यह अगली पोस्ट में…

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

2 COMMENTS

    • आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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