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ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरंभ तो कर दिया लेकिन उसकी वृद्धि से श्रीविष्णु और महादेव संतुष्ट न थे. आरंभ में ब्रहमा अपनी कल्पना से सृष्टि की रचना कर रहे थे.

ब्रह्मदेव भी चिंतित थे. ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु से राह सुझाने को कहा. श्रीहरि ने कहा इसकी राह तो महादेव ही बता सकते हैं. आप उन्हें प्रसन्न करें.

ब्रह्माजी ने शिवजी का ध्यान करना शुरू किया. सदाशिव प्रसन्न हुए और आकाशवाणी की- मैं आपकी चिंता जानता हूं. आप मैथुनी सृष्टि (संभोग मार्ग से) की व्यवस्था करें. तभी आपका कार्य पूरा होगा.

ब्रह्मा ने महादेव के आदेश से मैथुनी सृष्टि के लिए नारी बनाने का निर्णय किया लेकिन वह नारी (गर्भधारण में समर्थ) की कल्पना ही नहीं कर पा रहे थे.

ब्रह्माजी फिर महादेव की शरण में गए. उन्होंने महादेव को प्रसन्न करने के लिए फिर से घोर तप करना शुरू किया. ब्रह्मदेव के तप का मनोरथ जानकर महादेव बड़े प्रसन्न हुए.

महादेव ने कहा- आप मैथुनी सृष्टि की रचना करिए. पुरुषतत्व और स्त्रीतत्व मिलकर सृष्टि को बढ़ाएंगे. तभी सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया सार्थक और पूर्ण होगी.

ब्रह्माजी ने पूछा- वह कैसे प्रभु? स्त्रीतत्व क्या है? सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया सार्थक और पूर्ण होने से आपका क्या आशय है? मैं तो भ्रमित हो गया हूं.

शिवजी हंसे. उन्होंने कहा- आप भ्रमित न हो आदिसृष्टिकर्ता. स्त्रीतत्व सृजन का तत्व होगा जो कार्य आप करते हैं उस कार्य के लिए सभी जीवों को सक्षम बना दिया जाए. आपको मैथुनी व्यवस्था देनी होगी इसलिए लिए स्त्री की रचना करनी होगी.

ब्रह्माजी ने पूछा- स्त्री क्या है मैंने तो देखा ही नहीं तो उसकी कल्पना कैसे करूं प्रभु और मेरा एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है. आपने कहा कि सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया तभी सार्थक और पूर्ण होगी.

शिवजी ने ब्रह्माजी से कहा- ब्रह्मदेव पहले मैं आपको अपने एक स्वरूप का दर्शन कराता हूं. आप उसे अच्छे से देख समझ लें. उसके बाद मैं आपके प्रश्नों के उत्तर दूंगा.

शिवजी ने एक रूप धरा- अर्धनारीशिवर का. आधा शरीर पुरुष रूप में था, आधा शरीर नारी का था. वह त्रिशूल और सर्प से सुशोभित थे तो सुंदर कंठाहार और हाथों में कमल पुष्प भी था.

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