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रामकृष्ण परमहंस सिद्ध संत थे. समस्त सिद्धियों को प्राप्त करने के बाद भी वह शिष्यों को तंत्र साधना के स्थान पर ज्ञान साधना के लिए प्रेरित किया करते थे.
छोटी-छोटी कथाओं और अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं के माध्यम से वह अपने शिष्यों को प्रेरित किया करते थे. श्रीरामकृष्ण परमहंस की पूरी जीवन प्रेरक और हैरान कर देने वाली घटनाओं से भरा पड़ा है.
आज हम आपको एक छोटी सी कथा सुना रहे हैं जिससे आपको सीखने को मिलेगा कि बड़े-बड़े प्रवचनों के स्थान छोटी-छोटी बातों, छोटे-छोटे उदाहऱणों से ज्यादा बड़ी बात की जा सकती है जिसका असर ज्यादा गहरा होता है.
एक समय की घटना है. श्री रामकृष्ण परमहंस रोज बहुत लगन से अपना लोटा राख या मिट्टी से मांजकर खूब चमकाते थे. श्री परमहंस का लोटा खूब चमकता था.
उनके एक शिष्य को श्रीरामकृष्ण के इस कार्य से बड़ा कौतूहल होता. प्रतिदिन इतनी तल्लीनता से गुरू द्वारा लोटे को मांजकर चमकाना देखकर उसे बड़ा विचित्र लगता था.
वह सोचा करता कि सारी दुनिया के वैभव से दूर रहने वाले हमारे गुरूदेव की जान इस लोटे में क्यों अटकी है. जिनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए लोग घंटों प्रतीक्षा करते रहते हैं उन्हें अपना एक मिनटा का समय भी ऐसे कार्यों को देना फिजूल है.
मुझसे या किसी शिष्य से कह सकते हैं. हम उनका लोटा मांज देंगें. और फिर लोटा ही तो है. इसकी चमक के लिए ऐसे ज्ञानी व्यक्ति का एक पल भी देना व्यर्थ है.
यह प्रश्न उसे सताता रहता था. आख़िर उससे रहा नहीं गया. उसने मन की पीड़ा निकाल देने का निश्चय किया.
वह सीधा गुरुदेव श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के पास पहुंचा और पूछ ही बैठा- “गुरू महाराज! आपका लोटा तो वैसे ही खूब चमकता है. इतना चमकता है कि इसमें हम अपनी छवि भी देख लें. फिर भी रोज-रोज आप इसे मिट्टी, राख और जून से मांजने में इतनी मेहनत क्यों करते है?
आपका समय तो अनमोल है. जो अनमोल समय आपके दर्शनार्थियों का जीवन बदलेगा उसका एक पल भी इस लोटे के पीछे खर्च करने का मुझे औचित्य समझ नहीं आया.
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