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चोरों का पीछा करते हुए राजा के सैनिक आए. चोरों ने प्राण बचाने के लिए चोरी का धन आश्रम में रख दिया और छिप गए. सैनिकों ने माण्डव्य से चोरों और धन के बारे में पूछा लेकिन मौन व्रत के कारण वह चुप ही रहे.
सैनिकों ने खोजा तो चोरी का धन और चोर आश्रम में ही मिल गए. सैनिकों ने चोरों के साथ माण्डव्य को भी बांधा और राजा के पास ले गए. उस राज्य में चोरी का दंड था सूली पर चढ़ाकर मृत्यु देना.
मौन धारण करने के कारण मुनि अपना प्रतिवाद कर नहीं पाए इसलिए नियम अनुसार उन्हें भी चोरों के साथ सूली पर चढ़ाया गया. माण्डव्य ऋषि शूल के अग्र भाग पर बैठे हुए ही तप करते रहे. व्रत और अनाहार के कारण सूली पर चढ़ने से भी मृत्यु नहीं हुई.
शूल से भी एक मुनि के प्राण नहीं निकले यह बात फैल गई. तत्काल कई ऋषि-मुनि आए और सारी बात समझ गए. उन्होंने राजा की इसके लिए बहुत निंदा की.
राजा भागा आया और माण्डव्य से क्षमा मांगने लगा. उसने हर प्रकार से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास किया. मुनि प्रसन्न हो गए और राजा को क्षमा कर दिया.
मुनि को शूली से उतार दिया गया. शूल का कुछ हिस्सा उनके शरीर में प्रवेश कर गया था वह प्रयास करने पर भी नहीं निकला तो काट दिया गया. इसी से इनका नाम अणिमाण्डव्य पड़ा.
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