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राजा परीक्षित के बेटे और अभिमन्यु के पौत्र जनमेजय ने महात्मा विदुर के बारे में बहुत कुछ सुना. उनके ज्ञान, धर्मपरायणता और बुद्धिमता के बारे में सुनकर जनमेजय को विदुरजी के बारे में जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हुई.

जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायनजी ने कहा- राजन! विदुर धर्मराज के अवतार थे. महात्मा माण्डव्य के शाप से धर्मराज को विदुर रूप में उत्पन्न होना पड़ा. वह कथा मैं आपको सुनाता हूं.

माण्डव्य नामक एक धैर्यवान, धर्म के ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तेजस्वी मुनि थे. अपने आश्रम में मौनव्रत धारण करके वह कठिन तपस्या कर रहे थे. एक दिन राजमहल में चोरी करने के बाद कुछ चोर भागते हुए आए और मुनि के आश्रम में छिप गए.
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