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माता ने यह भी कह था कि जब तक तुम पीछे मुड कर नहीं देखोगे, तब तक मैं तुम्हारे साथ रहूंगी. मेरी मौजूदगी का अहसास मेरे पैरों के नुपूर या बिछुवे की आवाज तुम्हें कराती रहेगी. फिर भी यदि तुमने पीछे मुड़ कर देख लिया तो समझो कि मैं चली.
राजा अन्नमदेव लगातार विजय पथ पर बढते रहे, बढते रहे, माता के पैरों की नूपूर की ध्वनि पीछे से लगातार आती रही, राजा का उत्साह दिन दूना रात चौगुना बढता रहा. पर बस्तर पहुंच कर शंखिनी-डंकिनी नदी के तट पर राजा अन्नमदेव के कानों में नूपूर की आवाज आनी अचानक बंद हो गई.
वारांगल से सैकडों कोस दूर आने तक और पूरे बस्तर में अपना राज्य स्थापित करने तक महाप्रतापी राजा अन्न्मदेव के कानों में नुपूर की ध्वनि गूंजती रही थी. उनके कानों को जैसे उसकी आदत सी पड़ गयी थी. नूपूर ध्वनि के बंद हो जाने से राजा अन्न्मदेव चौंक गये.
हड़बड़ाहट और भविष्य में हार के भय की घबराहट तथा यह जानने की उत्सुकता कि ऐसा क्या हुआ कि मां के पैरों के नुपूर की आवाज आनी बंद हो गयी, अन्नम ने बिना कुछ सोचे समझे पीछे मुड़ कर देखा. ऐसे में वरदान की बात याद ही नहीं रही.
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