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घायल विक्रमादित्य जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ रहे थे कि डाकुओं ने हमला कर दिया. उनके सिर पर मुकुट एवं अन्य आभूषण देखा तो समझे कि कोई व्यापारी है जो जंगल में धन छुपाने आया है.
उनके सारे आभूषण लूटने के बाद गड़े हुए धन के बारे में पूछते रहे पर ऐसा कोई धन हो तो विक्रमादित्य बताएं. डाकुओं को विश्वास न हुआ. उन्होंने क्रोध में राजा को खूब पीटा और मरा हुआ समझकर वहीं फेंक गए.
कुछ समय बाद विक्रमादित्य को होश आया. पीड़ा से कराह रहे थे. फि सोचा- डाकुओं ने गहने ही लिए जान तो नहीं ली. अब जंगल से निकला जाए.
वह पानी पीने नदी किनारे पहुंचे तो फिसलन पर पांव पड़ा और नदी की धारा में फंसकर बहते-बहते बहुत दूर चले गए.
वहां से किसी तरह किनारे पहुंच कर एक नगर में पहुंचे. फटेहाल और शरीर पर चोट के निशान वाले राजा सम्राट विक्रमादित्य भिक्षुक जैसे लग रहे थे.
भूख-प्यास से बेहाल विक्रमादित्य शहर में एक दूकान के सामने पेड़ के नीचे बैठ गए. दुकानदार की उस दिन बिक्री बहुत बढ़ गई.
दुकानदार ने सोचा यह दुकान के बाहर बैठा तो बिक्री बढ़ गई. क्यों न इस गरीब को इसी तरह रोज बिठाकर रखा जाए ताकि मुनाफा बढ़ता रहे.
लंबे समय तक इसी तरह बिक्री के लालच में दुकानदार ने विक्रम को घर चलकर भोजन करने का न्योता दिया.
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