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इस घटना के कुछ दिनों बाद सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में घोड़े का व्यापारी आया. उसके पास ऐसे सुंदर घोड़े थे जैसे वे इस लोक के हों ही नहीं. देवलोक के अश्व दिखते थे. उन अश्वों पर किसी को भी लोभ आ जाए.

व्यापारी बोला- महाराज आपके राज्य की संपन्नता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी पर अनुभव वैसा नहीं है. यहां तो मेरा घोड़ा खरीदने वाला कोई भी नहीं है.

आप देखें इसे, मेरा घोड़ा महंगा तो है पर साधारण नहीं है. अद्भुत खूबी वाला है. यह एक छलांग में आसमान पर तो दूसरे में धरती पर पहुंच जाता है.

घोड़े आकर्षक तो थे पर एक छलांग में आसमान की बात पर विक्रमादित्य को विश्वास नहीं हुआ जो कि स्वाभाविक भी था. व्यापारी ने पूरे राज्य की संपन्नता पर प्रश्न कर दिया था इसलिए घोड़ा खरीदना भी जरूरी था.

राजा ने कहा कि घोड़ा तो वह खरीद लेंगे पर पहले सवारी करके खूबी जांचेंगे. व्यापारी मान गया.

विक्रमादित्य घोड़े पर बैठे. घोड़े ने छलांग लगाई और सचमुच पहली ही छलांग में उन्हें आसमान में ले गया पर दूसरी छलांग में घोड़ा धरती पर नहीं आया.

घोड़े ने धरती के कुछ ऊपर से ही राजा को उनके राज्य से बहुत दूर एक ऐसे जंगल में फेंक दिया जहां उन्हें जानने वाला कोई नहीं था.

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