[sc:fb]
जबकि वहां उपस्थित एक विद्वान ब्राहमण ने समझाया कि आप शनि के कर्मों की व्याख्या सो सही संदर्भ में नहीं ले रहे. शनि की ताकत धरती पर धर्म की रक्षा करती है. इसलिए वह महान और पूजनीय हैं.
यदि शनि का प्रभाव न रहे तो व्यक्ति निरंकुश स्वभाव का होकर सबका अहित करे. कर्मों का दंड देकर शनि विधि-व्यवस्था बनाए रखते हैं. यह आवश्यक है.
दैवयोग से विक्रमादित्य तो उस दिन कुछ सुनने को तैयार ही न थे. उन्हें तो शनिदेव में सबकुछ निंदनीय ही लगता था.
ब्राह्मण ने कहा- महाराज! आपकी कुंडली के बारहवें घर में शनि हैं. यह बहुत खराब योग है. आपको इस बात को लेकर विशेष रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है.
आप शनि का भूले से भी अपमान न किया करें. जितना संभव हो उन्हें प्रसन्न रखें ताकि आप उनकी कोप दृष्टि ज्यादा न हो.
विक्रमादित्य तो अहंकार में चूर थे. उन्होंने कहा- हो सकता है पर मैं शनि को महान नहीं मान सकता. मुझे चुनौती स्वीकार है. जो होना है होकर रहेगा.
मेरे साथ मेरी प्रजा और महादेव का आशीर्वाद है. शनि चाहकर भी मेरा कोई अनिष्ट नहींं कर सकते. मैं उन्हें चुनौती देता हूं.
विक्रमादित्य ने बुद्धिभ्रम में पड़कर शनिदेव का अपमान कर दिया.
शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.