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केवल एक चूहा ही था जो बिल्ली की इच्छा के कारण बिल्ली के पेट में कब का जा चुका था. मृत्यु के कारण चूहे की इच्छाएं समाप्त हो गई थीं.

परी को एहसास हुआ उसने अंजाने में ही एक बड़ी गलती कर दी है.

किसानों को कष्ट दे दिया. सेठ का भ्रष्टाचार बढ़ा दिया. राजकुमारी अब बस स्वप्नलोक में रहती है.

कुत्ता और बिल्ली परिश्रम और संघर्ष का अपना स्वभाव त्याग चुके हैं. बस चूहे की कोई इच्छा नहीं.

यानी प्राणी जब तक जीवित है उसमें अनन्त इच्छाएं जन्म लेती रहती हैं. वे तब तक समाप्त नहीं होतीं जब तक उसकी मृत्यु नहीं हो जाती.

परी ने निश्चय किया कि पृथ्वी लोक पर किसी की भी इच्छा पूरी करने की सोचेगी ही नहीं क्योंकि यहां के प्राणियों में एक चीज बिल्कुल नहीं है वह है संतोष.

परी ने गलत निष्कर्ष निकाला क्या, ईमानदारी से हृदय से सोचकर बोलिएगा! उनकी वह इच्छा शायद पूरी न हुई होती तो ही वे बेहतर जीव थे. है न! ये इच्छाओं का मायाजाल ही सारी परेशानियों का चक्रव्यूह रच रहा है और हम कलियुग को कोस रहे हैं.

सिर्फ मांगने वाले से भगवान भी दूरी करते हैं. वह भाव लाइए कि हे प्रभु आपकी कृपा से बहुत कुछ प्राप्त है. जो प्राप्त है वह पर्याप्त है.

पर ये करें कैसे. इसका एक आसान तरीका है. एक ऐसे उदाहरण से समझते हैं जिससे हर व्यक्ति गुजरा होगा.

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2 COMMENTS

  1. अति उत्तम कथा भाई आप से क़रज़ोर विनम्र निवेदन हैं की ऐसी कथाएँ हमारे मेल पे भेजने का कस्त करे

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