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तुलसी का क्रोध अभी शांत नहीं हुआ था. उसने भगवान को एक और शाप दिया- आपका हृदय पत्थर का बना है इसलिए आप पत्थर हो जाइए.
जय-विजय को इस पाप का भागीदार होने के कारण तुलसी ने शाप दिया कि तुम श्रीहरि के पत्नी वियोग का कारण बनोगे. जय-विजय रावण और मारीच हुए जिन्होंने सीताहरण कर प्रभु को पत्नी वियोग दिया.
तुलसी के शाप के बाद सभी देवता वहां प्रकट हो गए और उन्होंने तुलसी से कहा कि इसमें प्रभु का दोष नहीं है. हमारी जिद पर उन्होंने ऐसा किया. आप उन्हें क्षमा कर दें.
तुलसी ने कहा- श्रीहरि पर शाप का असर तो तभी होता है जब वह उसे स्वीकार करें. मैंने अपने शाप से उन्हें मुक्त कर दिया है.
श्रीहरि बोले- मैं शाप स्वीकार करता हूं. मैंने तुलसी का पतिव्रत भंग किया इसलिए मैं इसे पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूं. यह धरती पर तुलसी के पौधे के रूप में पूजी जाएंगी औऱ मैं इनके चरणों में शालिग्राम बनकर पड़ा रहूंगा.
बिना तुलसी का भोग लगाए देव पूजा अधूरी रहेगी. प्रतिवर्ष मेरा और तुलसी के विवाह का आयोजन होगा उसके बाद ही मानव विवाह संस्कार आरंभ करेंगे. इसी कारण हर साल विष्णु भगवान के चतुर्मास विश्राम के बाद तुलसी विवाह कराया जाता है और उसके बाद विवाह शुरू होते हैं.
उधर तुलसी का शाप गणेशजी का पीछा भी कर रहा था और पीड़ित भी. गणेशजी को तो एक सुंदर लीला का बहाना मिल गया था. ब्रह्मचारी गणेशजी विवाह के लिए परेशान थे.
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