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दोनों देवता नारद की खोज करने भूलोक पहुंचे. वे बहुत दिनों तक नारद की खोज करते रहे. अंत में एक दिन नारदजी गंगा स्नान कर रहे थे, तभी वरुण देव ने उन्हें देख लिया. उन्होंने वायु को संकेत में समझा दिया.

वरुण देव के संकेत करते ही वायु देव तेजी से बहने लगे. गंगा किनारे पर नारदजी की वीणा रखी हुई थी. उनके स्पर्श से वीणा बज उठी.

नारदजी ने जब वीणा सुनी तो हैरान रह गए क्योंकि उन्होंने वीणा बजाना ही छोड़ रखा था.

वीणा की ध्वनि सुनकर नारदजी भागे-भागे किनारे पर आये. वहाँ उन्होंने देखा कि दोनों देवता मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैँ. उन्हें देख नारदजी बोले- “अरे आप कब आए? देवलोक के क्या हाल-चाल हैँ?”

वरुण देव और वायुदेव ने नम्रता पूर्वक कहा-”हे देवर्षि! आपके बिना देवलोक में सब सूना-सूना है। हम आपको लेने आए हैं.”

यह सुनकर नारदजी का क्रोध एकदम शांत हो गया. उन्होंने तीनों सिद्ध पाषाण गंगा में प्रवाहित कर दिए. फिर वे प्रसन्न होकर वायु और वरूण देव के साथ देवलोक की ओर चल दिए. (लोककथा)

संकलनः चंद्रकिरण

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