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उन्होंने सारी परिस्थिति अर्जुन के सामने रखी. चित्रसेन अर्जुन का मित्र भी था. अर्जुन ने सुभद्रा को सांत्वना दी और कहा कि तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी होगी.

नारदजी इधर का खेल सजाकर द्वारका पहुंचे और श्रीकृष्ण से कह दिया कि अर्जुन ने चित्रसेन को आश्रय दे रखा है. इसलिए आप सोच-विचारकर ही युद्ध के लिए चलें.

भगवान ने कहा- नारदजी! आप मेरी ओर से अर्जुन को समझाकर लौटाने की चेष्टा करिए.  अर्जुन ने साफ कह दिया- यद्यपि मैं श्रीकृष्ण की शरण में हूं, लेकिन उन्होंने ही शरणागत की रक्षा का उपदेश दिया था.

इसलिए मैं धर्म से विमुख नहीं हो सकता. उनके बल पर ही अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करूंगा.  वह ईश्वर हैं और प्रतिज्ञा छोड़ने में समर्थ हैं. मैं मानव हूं मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है.

देवर्षि द्वारका आए अर्जुन का वृत्तांत कह सुनाया. अब युद्ध की तैयारी हुई. सभी यादव और पाण्डव रणक्षेत्र में पूरी सेना के साथ उपस्थित हुए.

घमासान लड़ाई हुई, पर निर्णय नहीं हो रहा था. श्रीकृष्ण जब भी कोई प्रहार करते, अर्जुन श्रीकृष्ण का स्मरण कर उनसे रक्षा की गुहार लगाकर जवाबी प्रहार करते.

प्रभु ने अर्जुन के रक्षक बने रहने का वरदान दिया था. अर्जुन उसका फायदा उठा रहे थे. अंत में श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र निकाला.

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