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द्रोपदी पृथ्वीराज की कन्या के रूप में वेला नाम से प्रसिद्ध होगी. महादानी कर्ण तारक नाम से जन्मेगा. यह सब बातें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराए.
श्रीकृष्ण ने कहा- मैं भी अवतार लेकर पांडवों की सहायता करूँगा. माया देवी द्वारा निर्मित महावती नाम की नगरी में देशराज के पुत्र-रूप में मेरा अंश उत्पन्न होगा.
मेरे इस कृष्णांश को जगत उदयसिंह (ऊदल) के नाम से जानेगा. उसे जो जन्म देंगी वह भी देवकी की ही अंश होंगी. मेरे वैकुण्ठ धाम का अंश आह्राद नाम से जन्म लेगा.
आह्लाद ही इस जन्म में मेरा गुरु होगा. अग्निवंश में उत्पन्न राजाओं का विनाश कर मैं धर्म की स्थापना करूँगा. श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर शिवजी अंतर्धान हो गए. (संदर्भ: भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व का तीसरा खंड के पहले अध्याय से व अन्य)
सभी प्रभु प्रेमियों को नमस्कार. मित्रों, हमने पहले भी कहा है कि वेद-पुराण-उपनिषद आदि ग्रंथ हमारे पूर्वजों की धरोहर हैं. मैं खुद को इतना सक्षम नहीं पाता हूं कि पूर्वजों के ज्ञान को चुनौती दे सकूं. आस्था और भक्ति तर्क से ऊपर की चीज है. प्रभु की लीला तो प्रभु ही जानें.
पिता, अपने पुत्र को बचपन में कोई ज्ञान देता है और पुत्र इसे स्वीकारने पहले यह नहीं पूछता कि पिताजी आप मेरी डीएनए रिपोर्ट दिखाइए. वह तो पिता-पुत्र के बीच स्नेह का बंधन है. ईश्वर से हमारा भी बंधन ऐसा ही हो.
हम पुराणों में जो गूढ़ बातें कही गई हैं, जो कथाएं हैं उन्हें आपके समक्ष रखते हैं. आप उन्हें किस रूप में लेते हैं यह आपके विवेक पर छोड़ता हूं. मैं तो इसे सादर भाव से स्वीकार करता हूं, इसलिए आपके समक्ष रखता हूं.
-राजन प्रकाश
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आखिर क्यों इस कथा के सुनने से मिलता है मोक्ष?
यह कथा गढ़ी हुई है और गलत है। भविष्य पुराण को काफी हद तक बदला गया है। महाभारत युद्ध आरम्भ होने के बाद कहीं भी भगवान् शिव की पूजा का उल्लेख वेदकव्यास द्वारा कही गयी और भगवान् गणेश द्वारा लिखी “जय संहिता” यानि महाभारत के किसी खण्ड में नहीं है। इस कथा को पृथ्वीराज चौहान व् उनके कुल में उत्पन्न राजपूतों के वध हेतु झूठा बनाकर लिखा गया था, क्यूंकि आल्हा और उद्दल के महोबा राज्य की चौहान कुल से शत्रुता थी।
सत्य यह है कि राजस्थान के लोक गीतों व् स्थानीय इतिहास में आल्हा को भीम का व् उद्दल को युद्धिष्ठिर का अवतार माना जाता है, परन्तु इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस मान्यता का आधार यह भी है कि दोनों आल्हा व् उद्दल दैवीय शक्तियों से युक्त थे और स्वयं अश्वत्थामा ने पृथ्वीराज को दो शबदभेदि दिव्य बाण आल्हा और उद्दल मारने के लिए दिए थे, जिनमें से एक बाण सेचौहान ने आल्हा को मारा था व् दूसरे बाण से अपने सौतले मामा शाहबुद्दीन घुरी को।