हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:fb]
हे राजा भोज मैं चलता हुआ खाता नही हूं, हंसता हुआ जल नहीं पीता. चलता हुआ शौच नहीं करता हूं अर्थात मैं पशुओं की तरह चलते-चलते मलत्याग नही करता. अच्छा काम करने में ज्यादा सोच विचार नही करता अर्थात शुभ कार्य को शीघ्रता से पूरा करता हूं.
दो व्यक्तियों के मध्य जब एकांत में कोई गुप्त मन्त्रणा हो रही होती है तो मैं बिना सूचना के तीसरे व्यक्ति के रूप में उपस्थित होकर बाधा नही बनता अर्थात दाल भात में मूसलचंद नही बनता और स्वयं की प्रशंसा भी नही करता हूँ.
मेरे अंदर ऐसा कोई भी लक्षण नहीं है जिसके कारण मुझे मूर्खों की श्रेणी में गिना जाए, फिर भी हे राजन! आपने मुझे मूर्खराज कहा. आपने ऐसा संबोधन क्यों किया, मेरी जिज्ञासा शांत करें.
राजा को अपने प्रश्न का जवाब इस श्लोक में मिल गया था और उन्होंने कालिदास को उचित पारितोषिक प्रदान किया और अपने समकक्ष सिंहासन पर बिठाया.
शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.
Dear sir
Very very useful knowledgeable story.
I LIKE IT
Thanks & Regards
आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
आप नियमित पोस्ट के लिए कृपया प्रभु शरणम् से जुड़ें. ज्यादा सरलता से पोस्ट प्राप्त होंगे और हर अपडेट आपको मिलता रहेगा. हिंदुओं के लिए बहुत उपयोगी है. आप एक बार देखिए तो सही. अच्छा न लगे तो डिलिट कर दीजिएगा. हमें विश्वास है कि यह आपको इतना पसंद आएगा कि आपके जीवन का अंग बन जाएगा. प्रभु शरणम् ऐप्प का लिंक? https://goo.gl/tS7auA