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गरूड़ पुराण में साफ-साफ कहा गया है कि आत्मा शरीर त्यागने के बारह दिनों बाद धर्मराज के पास पहुंचती है. इस बीच उसे बहुत से ऐसे पड़ावों से होकर गुजरना पड़ता है जहां सुख-दुख दोनों होते हैं.
मरने के बाद किए कर्मकांड ज्यादा से ज्यादा उस बारह दिन की गति में उस आत्मा का सहारा बन सकते हैं. उसके आगे का फल निर्धारण तो मृत्यु लोक यानी पृथ्वी लोक पर किए उस व्यक्ति के कार्यों से होता है.
परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं. उससे ही लोक-परलोक दोनों सुधारा जा सकता है. जीवनकाल में जितना संभव हो परोपकार करते रहें. किसी को दुख पहुंचाने के भाव से मुक्त हो जाएं.
हिंसा चाहे वह शारीरिक हिंसा हो या जिह्वा हिंसा उससे रहित मनुष्य को ईश्वर अपने बराबर में स्थान देते हैं.
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