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क्या मेरी कोई उपयोगिता है? मुझे लगता है कि शायद मैं धरती पर बोझ हूं. भगवान ने मुझे धरती पर भेजा ही क्यों? मेरा कहीं कोई सम्मान नहीं है. मैं जिंदा क्यों हूं?

रोज ऐसे प्रश्न लोग मुझसे पूछ रहे हैं. उन्हें अपने तरीके से समझाकर उनका हौसला बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं लेकिन अकेले मेरे करने से नहीं होगा. आइए सभी मिलकर यह दायित्व उठाएं क्योंकि हम सभी के आसपास ऐसे लोग हैं जिनका आत्मविश्वास डोल गया है.

हमारा थोड़ा सा नैतिक सहारा उन्हें मिल जाए तो वे फिर से खड़े हो सकते हैं. जिसका मन दुखी है उसे प्रवचन से शांति नहीं मिलती. पर उपदेश कुशल बहुतेरे. इसलिए कोई प्रवचन नहीं करना चाहता, छोटी सी बात कहना चाहता हूं.

हर व्यक्ति की अपनी उपयोगिता है. अपने रूप, गुण, कद-काठी, सामर्थ्य आदि को लेकर हीनभावना मन में न लाएं. यदि आप स्वयं ही अपनी कद्र नहीं करेंगे तो संसार क्यों करेगा? कभी देखा है किसी दुकानदार को अपने सामान की बुराई करते?

ईश्वर हमारे पूर्वजन्म के किसी कर्म के लिए दंडित करने को हमें कोई ऐब दे देते हैं. जैसे जो व्यक्ति हकलाने वालों का उपहास करता है उसे अगले जन्म में गूंगा होना पड़ता है. जो विकलांग को दुखी करता है वह अगले जन्म में अपंग होता है.

जो हमारे साथ बुरा हो रहा है वह हमारे पूर्वजन्मों के कर्म का दंड है परंतु प्रभु की दया असीमित है. तमाम दंड के बीच वह हमें सुधरने और अपना जीवन सुखी करने के लिए कोई न कोई कारण दे ही जाते हैं.

तो यह अच्छा नहीं होगा कि स्वयं को हीन समझने और ईश्वर को कोसने में समय गंवाने के स्थान पर अपने अंदर का दैवीय गुण तलाशकर उसे उभारा जाए, जो कमी रह गई उसकी पूर्ति कर ली जाए.

अपनी नीयत और अपने कर्म ठीक रखिए, बाकी ईश्वर पर छोड़ दीजिए. आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं.

एक बड़े तालाब से लगा एक बागीचा था. बागीचा इंतने सुंदर फूलों से भरा था कि लोग दूर-दूर से देखने आते और खुश होकर खूब तारीफ करते.

गुलाब का एक पत्ता रोज लोगों को आते-जाते और गुलाब के फूलों की तारीफ करते देखता. उसे लगता कि हो सकता है शायद ऐसा भी एक दिन आए जब कोई उसकी भी तारीफ करे.

बहुत दिन बीत गए लेकिन किसी ने उसकी तारीफ नहीं की. पत्ता खुद को काफी हीन महसूस करने लगा. उसके मन में तरह-तरह के विचार आने लगे.

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