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भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आशीर्वाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए.

गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के वैधव्य मिटाने का उपाय कहिए. उनकी विनती से साधु दयालु हो गए.

उन्होंने ध्यान लगाया और अपनी अंतर्दृष्टि से पता करके बताया- पड़ोस के गांव में सोना नाम की एक धोबन अपने बेटे और बहू के साथ रहती है. सोना बहुत ही आचार-विचार और संस्कार संपन्न पतिपरायण स्त्री है.

यदि यह कन्या अपनी सेवा से सोना को प्रसन्न कर ले और सोना धोबिन इसके विवाह में आए और अपनी मांग का सिन्दूर इसे लगा दे तो उसके बाद इस कन्या का विवाह करो तो इसका वैधव्य दोष मिट सकता है.

साधू ने यह भी बताया कि सोना कहीं आती जाती नहीं है. उसे प्रसन्न करने का तुम्हें बहुत प्रयास करना होगा.

ब्राह्मणी ने जब सुना कि धोबिन की सेवा से बेटी का वैध्वय दोष मिट जाएगा तो उसे तुरंत अपने पुत्र के साथ सोना की खोज में भेज दिया.

देवस्वामी के सबसे छोटे पुत्र शिवस्वामी अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप को गया.

वे दोनों समुद्र के तट पर पहुँचकर समुद्र पार करने का उपाय सोचने लगे लेकिन उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा था.

थक-हार कर दोनों भाई-बहिन भूखे-प्यासे एक वट-वृक्ष की छाया में उदास होकर बैठे गए.

उस वृक्ष के तने की एक खोह में गिद्ध के बच्चे रहते थे. वे दिनभर इन दोनों को परेशान होते हुए देख रह थे.

शाम को बच्चों की माँ उनके लिए कुछ आहार लेकर आई और उन्हें खिलाने लगी लेकिन गिद्ध के बच्चों ने कुछ नहीं खाया.

गिद्ध के बच्चों ने अपनी माँ से कहा-इस वृक्ष के नीचे आज सुबह से ही दो भूखे-प्यासे प्राणी बैठे हैं. जब तक वे नहीं खाएंगे, हम लोग भी नहीं खाएंगे.

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