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इसके अलावा गणेश संकष्ट चतुर्थी व्रत की एक अन्य कथा है जो प्रचलित है-

प्राचीन समय में एक नगर में एक कुम्हार एक राज्य के सभी बर्तन बनाता था. जिसमें मिट्टी के बर्तन पकाए जाते हैं उसे आँवा कहते हैं. आँवा लगाने के एक वर्ष में बर्तन पक कर तैयार होते थे.

एक बार उस कुम्हार ने आँवा लगाया परन्तु बर्तन पके ही नहीं. इससे वह कुम्हार परेशान होकर राजा के पास गया. राजा ने आँवा ना पकने का कारण राजपण्डित से पूछा.

राज पण्डित ने कहा कि जब भी आँवा लगाया जाएगा तब एक बच्चे की बलि देने से आँवा पकेगा अन्यथा आँवा नहीं पकेगा| राजा ने आज्ञा दी कि प्रत्येक वर्ष एक घर से एक बच्चे की बलि दी जाएगी. इस प्रकार आँवा पकाने के लिए हर वर्ष एक बच्चे की बलि देने का प्रचलन चल पडा़.

कुछ वर्षों बाद राज्य में रहने वाली एक बुढि़या के बेटे की बलि की बारी आई. बुढि़या का उसके बेटे के अलावा कोई अन्य सहारा नहीं था. बुढि़या को अपने बेटे के जाने का बहुत दु:ख था.

वह सोचने लगी कि मेरा तो एक ही बेटा है और वह भी मुझसे जुदा हो जाएगा. उसने अपने कलेजे पर पत्थर रख कर अपने बेटे को बलि के लिए भेज दिया. बुढि़या ने उस दिन संकष्ट चतुर्थी का व्रत रखा हुआ था.

उसने अपने बेटे के हाथ में थोडे़ से तिल देकर कहा कि जब तुम आँवे में बैठोगे तब अपने चारों ओर यह तिल डाल देना बाकि भगवान गणेश पर छोड़ देना वो जैसा चाहेगें वैसा करेंगें.

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2 COMMENTS

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