March 23, 2026

शिवकिंकर शृंखलाः चार ब्राह्मणों ने अपनी विद्या से जीवित कर दिया एक शेर. शेर ने चारों को खा लिया, दोषी कौन?

कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता था. उसके नगर में एक ब्राह्मण रहता था. जिसके चार बेटे थे. लड़के जब तक सयाने हुए तब तक ब्राह्मण दिवंगत हो गया. ब्राह्मणी भी उसके साथ सती हो गयी.

ब्राह्मण-ब्राहमणी के मरते ही उनके रिश्तेदारों ने उनका सारा धन छीन लिया. चारों पुत्रों का कोई आसरा न रहा तो चारों अपने नाना के यहां चले गए. लेकिन कुछ दिन बाद वहां भी उनके साथ बुरा व्यवहार होने लगा.

सभी ओर से प्रताडित ब्राह्मण किशोरों ने मिलकर सोचा कि अब समय आ गया है कि कोई न कोई विद्या सीखनी चाहिए. विद्या सीखकर कुछ धन कमाया जाए तो ही इस प्रताड़ना से बचा जा सकता है. यह सोच करके चारों चार दिशाओं में चल दिए.

कुछ समय बाद वे विद्या सीखकर आपस में मिले. एक ने कहा- मैंने ऐसी विद्या सीखी है कि मैं मरे हुए प्राणी की हड्डियों पर मांस मज्जा चढाकर ऐसा बना सकता हूं कि वह सजीव सा दिखे. पर कमी बस इतनी है कि उस पर चमड़ा और बाल नहीं उगा सकता.

दूसरा बोला- इसमें परेशान होने की क्या बात है. मैंने जो विद्य सीखी है वह अनूठी है. मैं हुए मरे प्राणी पर भी खाल और बाल पैदा कर सकता हूं. इसके बाद वह वह बिल्कुल वैसा दिखने लगता है जैसा कि वह सच में होता है.

तीसरे ने कहा- मैं किसी क्षत-विक्षत प्राणी के सारे अंग उपांग पहले जैसा बन सकता हूं यहां तक कि वे सब जीवित प्राणियों के अंगों की तरह काम करने लगेंगे पर हां मैं मरे में जान नहीं डाल सकता हूं.

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उसकी बात समाप्त होती कि चौथा उतावलेपन से बोला- मैंने तो अपने गुरू से मरे में जान डालने की विद्या सीखी है. मैं उसमें जान डाल दे सकता हूँ. कोई परेशानी की बात ही नहीं है अब तो.

सबने मिलकर कहा अद्भुत. विचार हुआ कि सबने अलग-अलग अपनी विद्या का प्रयोग किया है. क्यों न एक साथ मिलकर सारी शक्तियों का प्रयोग करके एक बार आजमा लिया जाए.

विचार जम गया. चारों आपनी विद्या के संयुक्त प्रयास की परीक्षा को तैयार हो गए. फिर वे अपनी विद्या की परीक्षा लेने जंगल में गये. वहां उन्हें एक मरे हुए शेर की हड्डियां मिलीं.

वह बहुत हद तक क्षत-विक्षत और सड़ गल गई थीं. उसे बिना पहचाने ही उन्होंने उठा लिया. एक ने मांस डाला, दूसरे ने उसमें खाल और बाल पैदा कर दिए, तीसरे ने सारे अंग बनाए.

अब वह शेर बनकर तैयार हो चुका था. दिखने में तगड़ा और सुंदर स्वस्थ. बस प्राण ही नहीं थे. निष्प्राण होने के कारण शेर धरती पर पड़ा हुआ था. तीनों की विद्या का परीक्षण हो चुका था.

चौथा अपनी प्रतिभा दिखाने को इतना उतावला हो चुका था. इससे पहले कि उस शेर में प्राण डालने के संबंध में कोई निर्णय होता उसने आव देखा न ताव शेर में प्राण डाल दिए.

शेर जीवित हो उठा. वह भूखा था. उसे अपने सामने चार शिकार आराम से खड़े हो दिखे. इससे अच्छा अवसर क्या होता. उसने सबको मारकर खा लिया.

यह कथा सुनाकर बेताल बोला- हे राजा, चारों ब्राह्मण अकाल ही मृत्यु के ग्रास बन गये. भूल उन्हीं की थी तो, किसी अन्य का कोई दोष नहीं. पर यह बताओ कि उन चारों में इस दुर्घटना का अपराधी कौन है?

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राजा विक्रमादित्य ने कहा- जिसने शेर में प्राण डाले उसने ही सबसे बड़ा अपराध किया. उसके कारण ही सभी ब्राह्मण कुमारों के प्राण गए हैं. बेताल ने पूछा- ऐसा क्यों. सबका दोष बराबर का क्यों नहीं?

विक्रमादित्य ने कहा- जब उन्हें सड़ी गली हड्डियां दिखीं तो वे यह नहीं जानते थे कि ये किस जानवर के शेष हैं, क्योंकि वे ब्राह्मण कुमार थे, क्षत्रिय नहीं. इसलिए उन्होंने कभी शिकार नहीं किया होगा.

विद्या के प्रयोग से पहले ने हड्ड़ियों का दोष दूरकर उसमें सही किया और ढांचा गढ़ दिया. दूसरे ने विद्या के प्रयोग से उसमें मांस, रक्त आदि बना दिया. तीसरे ने उसमें त्वचा और बाल आदि बना दिए. तभी उन्हें पता चला होगा कि यह तो भयानक सिंह है.

चौथे व्यक्ति के पास सबसे अहम विद्या थी. जिसके पास जितनी ज्यादा बड़ी विद्य़ा या सिद्धि होती है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है. उसे सिंह में प्राण फूंकने चाहिए या नहीं इसका विचार करना चाहिए था लेकिन उसे तो ज्ञान के प्रदर्शन की बेचैनी थी.

इसलिए शेर में प्राण फूंकने वाला चौथा व्यक्ति ही सभी की अकाल मृत्यु का जिम्मेदार माना जाएगा. जिनके पास जितना गुण होता है, उतना ही उस गुण को संरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए, अन्यथा अनिष्ट होता है जैसा उन चारों के साथ हुआ.
(भविष्य पुराण से)

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