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एक बार सभी देवताओं की सभा हो रही थी. वे सभी नारदजी के बार-बार आने से परेशान थे.
उन्होंने सोचा- “नारद जी हम सबको परेशान करते रह्ते हैं. जब मन में आता है, आ जाते हैं. इधर उधर की बातों में हमारा समय खराब करते हैं. हमें किसी भी तरह इनसे छुटकारा पाना होगा.”
सभी देवताओं ने अपने अपने द्वारपाल से कहा- “नारद जी आएँ तो उन्हें अंदर न आने देना. किसी भी दशा में उन्हें अंदर प्रवेश न करने देना. कोई न कोई बहाना बनाकर उन्हें टाल देना.”
अगले दिन नारद जी शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे. नंदी ने भी उन्हें वहीं रोक दिया. नारदजी हैरान हो गए.
नंदी ने कहा- “हे देवर्षि! आप कही और जा कर वीणा बजाइए. भगवान शंकर से आप नहीं मिल पायेंगे.” यह सुनकर नारदजी सकपका गए.
जब नंदी ने उन्हें सारी बात बतायी तो वे क्रोध से आग-बबूला हो गए और सीधे क्षीरसागर विष्णु भगवान से शिकायत करने पहुंचे. नारदजी जैसे ही क्षीरसागर पहुंचे, गरूड ने उनका रास्ता रोक लिया.
नारदजी नई गरूड़ को बहुत समझाया, परंतु गरूड़ टस से मस नही हुये. हारकर वे वहां से वापस आ गए क्योंकि अब स्वर्ग लोक के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे.
अब नारद जी ने देवताओं से अपने अपमान का बदला लेने की सोची परन्तु उन्हें कोई रास्ता नही सूझ रहा था. एक दिन वे घूमते-घूमते काशी पहुंचे.
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