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माता ने भैरव से कहा, मैंने तुझे तमाम अवसर दिये और कई संकेत भी अब आखीरी मौक दे कर यहां से जा रही हूं पर तू अब भी अपनी से बाज न आया और यहां से न टला तो मैं तेरा वध कर दूंगी. यह कह कर मां दुर्गा गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं. वह गुफा आज गर्भ जून के नाम से जानी जाती है.

भैरव ने देवी की लौटने की चेतावनी अनसुनी कर दी. मां लौटीं और गुफा के भीतर चली गईं. इस बार गुफा के मुहाने पर वीर लंगूर पहरा दे रहे थे. भैरव ने वीर लंगूर को ललकारा. वीर लंगूर बहुत बहादुरी से लड़े पर चाली, सिद्ध तांत्रिक भैरव नाथ की ताकतें मायावी थीं. वीर लंगूर थक कर निढाल होने लगे.

ऐसे में मां बाहर निकली. मां दुर्गा ने इस बार चंडी का रूप धारण किया. उन्होंने भैरव से कहा, बहुत हुआ अब तू मेरी मायावश यहां से वहां भटक रहा था. मैं चाहती तो तेरा वध पहले भी कर सकती थी पर तू शिव भक्त और विद्वान है इस लिये मौके दे रही थी. अब बहुत हुआ. और चंडी माता ने भैरव का सिर उड़ा दिया.

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