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योगमाया ने रोना शुरू किया. अचेत रक्षक जागे और कंस को सूचना दी. आठवीं संतान के बारे में सोचकर कंस को नींद ही न पड़ती थी. वह भागकर आया और कन्या को झपट लिया.
देवकी ने विनती की- भैया तुमने सभी पुत्र मार डाले. यह तो कन्या है. इससे क्या भय? इसे तो मुझे प्रदान कर दो. स्त्री का वध करने का पाप अपने सर पर मत लो.
कंस नहीं माना. उसने नवजात कन्या के पैर पकड़कर उसे चट्टान पर दे मारा. परंतु वह साधारण कन्या तो थी नहीं. कंस के हाथों से छूटकर हवा में उड़ीं और अपने वास्तविक रूप में आ गईं.
आठ भुजाओं में आठ भयंकर आयुध लिए प्रकट हुईं. उन्होंने क्रोध में आंखे लाल करके कंस को कहा- मुझे मारने की चेष्टा तुमने की. अरे मूर्ख! तेरा संहार करने वाला जन्म ले चुका है. तू निर्दोष बालकों की हत्या से बाज आ जा. यब बताकर देवी अंतर्धान हो गईं.
देवी की बात सुनकर कंस को आश्चर्य और भय भी हुआ. अपनी बहन के निरपराध नवजता शिशुओं के वध के दोष का भय उसे सता रहा था. उसने वसुदेव-देवकी के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा.
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