विश्वामित्र को वशिष्ठ को नीचा दिखाने का अवसर मिल रहा था. उन्होंने त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का वचन दिया. विश्वामित्र को मुख्य पुरोहित बनाकर विशाल यज्ञ का आयोजन कराया गया. सभी ऋषि-मुनियों को आमंत्रण दिया गया.
सभी ऋषिगण आए पर वशिष्ठ के सौ पुत्र चांडाल यजमान और क्षत्रिय पुरोहित द्वारा कराए जा रहे यज्ञ में शामिल होने से मना कर दिया. क्रोधित विश्वामित्र ने वशिष्ठ के सौ पुत्रों को अपनी शक्तियों से भस्म कर दिया.
यज्ञ आरंभ हुआ. आह्वान करने पर देवता यज्ञ भाग ग्रहण करने नहीं आए तो विश्वामित्र ने क्रोध से श्रुवा उठाकर त्रिशंकु को अपने तपोबल से स्वर्ग भेजने को तैयार हुए. त्रिशंकु आकाश की ओर उड़ा.
जब इन्द्र ने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग में आते देखा तो उसे वापस पृथ्वी की ओर धकेल दिया. त्रिशंकु उलटा होकर नीचे गिरा और विश्वामित्र को रक्षा के लिए पुकारा. विश्वामित्र ने तपोबल से उसको बीच ही में स्थिर कर दिया.
अब विश्वामित्र की देवताओं के साथ ठन गई. उन्होंने नई सृष्टि ही रचना करने का निश्चय किया. दक्षिण ध्रुव के समीप सप्तर्षि और नए नक्षत्र बना दिए. बहुत से जीव जंतु फल-मूल की रचना कर दी.
अब विश्वामित्र ने देवलोक और इंद्र बनाना चाहा तो इन्द्र समेत सभी देवता क्षमा मांगने लगे. विश्वामित्र मान गए. अपनी बनाई सृष्टि स्थिर रखकर और दक्षिण दिशा के आकाश में त्रिशंकु को ग्रह की भांति प्रकाशमान करके स्थिर कर दिया.
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