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वरूण देव ने कहा- मैं देवताओं के विधान के विपरीत बारिश करके उनको रुष्ट नहीं कर सकता लेकिन आपका तप व्यर्थ नहीं जाएगा. मैं जीवन रक्षा के योग्य जल का प्रबंध कर सकता हूं.

वरूणदेव ने कहा- मुनि आप एक गडढ़ा बनाएं. मैं उसमें ‘अक्षय’ जल डाल दूंगा जो कभी समाप्त नहीं होगा. इस तरह जीवों की रक्षा की व्यवस्था हो जाएगी और देवता भी अप्रसन्न नहीं होंगे. गौतम ने एक हाथ गहरा गड्ढा खोद दिया जिसे वरुण ने दिव्य जल से भर दिया.

वरुणदेव ने कहा– हे मुनि! यह अक्षुण्ण जल कभी नष्ट नहीं होगा और तीर्थ बनकर इस पृथ्वी पर आपके ही नाम से प्रसिद्ध होगा. यहां दान-पुण्य, हवन-यज्ञ, तर्पण, देवपूजन और पितरों का श्राद्ध, अक्षय फलदायी होंगे.

इस प्रकार वरुण से अक्षय जल की प्राप्ति के बाद गौतम आनन्द पूर्वक अपने नित्य नैमित्तिक कर्म, यज्ञ आदि सम्पन्न करने लगे. अपने हवन-यज्ञ के लिए धान, जौ, नीवार आदि उगाया.

जल और अन्न सुलभ होते ही वहाँ आकर ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी आदि फिर से बस गए. गौतम कुंड के जल को लेकर एक बार गौतम के आश्रम के समीप रहने वाली कुछ ब्राह्मणों की स्त्रियों का विवाद हो गया.

विवाद इतना बढ़ गया कि वे स्त्रियां अहल्या पर क्रोधित होकर प्रतिशोध के लिए उतारू हो गईं. सभी स्त्रियों ने अपने अपने पतियों से गौतम को नुक़सान पहुंचाने के लिए उकसाया.

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