January 28, 2026

सोमेश्वर ज्योतिर्लिंगः जहां महादेव की कृपा से चंद्रमा को मिली थी क्षय रोग से मुक्ति- शिव पुराण की कथा

Mahadev

द्वादश ज्योर्तिलिंगों में गुजरात के काठियावाड में स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है. शिव पुराण में है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का वर्णनः

प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ किया. चन्द्रमा जैसा सुंदर पति पाकर दक्षकन्याएं प्रसन्न थीं. हालांकि दक्ष ने अपनी पुत्रियों से कहा था कि चंद्रमा का चित्त चंचल है इसलिए उनके साथ सभी को विवाह का विचार छोड़ देना चाहिए.

चन्द्रमा को सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी सबसे ज्यादा प्रिय थीं. वह रोहिणी से विशेष प्रेम रखते थे जिससे अन्य पत्नियों को ईर्ष्या हुई. चन्द्रमा की अन्य पत्नियों को पति की उपेक्षा बहुत दुःखी कर रही थी.

वे सभी अपने पिता दक्ष के पास गईं और उनसे पति की उपेक्षा का विस्तृत कष्ट सुनाया. पुत्रियों की व्यथा और चन्द्रमा के व्यवहार के बारे में जानकर दक्ष कुपित हुए.

वह चंद्रमा से मिलने पहुंचे. उन्होंने चन्द्रमा को समझाया- आपने पवित्र कुल में जन्म लिया है. पत्नी किसी पुरुष के आश्रय में ही सुख-दुख समझती है. सभी स्त्रियाँ आपसे समान प्रेम की अपेक्षा रखती हैं. वे सब आपकी आश्रिता हैं. सबके साथ प्रेम रखना आपका कर्तव्य है.

दक्ष ने थोड़ी झिड़की लगाते हुए कहा- आपसे सबके प्रति समान प्रेम प्रदर्शन की अपेक्षा है. आगे ऐसा व्यवहार न करें जो शास्त्रोचित नहीं है. अपने आश्रितों के प्रति पक्षपाती आचरण नर्क का कारण होता है.

प्रजापति दक्ष को लगा कि उनके दामाद सभी शास्त्रों के विद्वान हैं. मार्ग से थोड़ा भटक गए थे और समझाने से सुधर जाएंगे. परंतु चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी.

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रोहिणी के प्रति उनकी आसक्ति ज्यादा रही और वह फिर से अन्य पत्नियों के प्रति अपने कर्त्तव्यों की अवहेलना करते गए. चंद्रमा उन सभी के प्रति अब भी उदासीन हैं, दक्ष ने जब यह सुना तो बड़े दुःखी हुए.

वह पुनः चन्द्रमा के पास आए और उन्हें नीति की बातें फिर से बताईं. दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की. दक्ष के बार-बार आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने दक्ष की अवहेलना ही की.

दक्ष इस बात से बड़े क्रोधित हुए और उन्होंने चंद्रमा को शाप दे दिया- अपने रूप और गुण के घमंड में चूर चंद्रमा तुम मेरे बार-बार आग्रह को ठुकरा रहे हो. तुम क्षय रोग से ग्रसित हो जाओ.

दक्ष के शाप देते ही चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गए. उनके क्षीण होते ही हाहाकार मच गया. सभी देवगण भी चिंतित हो गए. चन्द्रमा ने अपना दुख देवताओं तथा ऋषियों को बताया.

उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता ब्रह्माजी की शरण में गए. ब्रह्माजी ने कहा कि चंद्रमा को अपने करनी का दंड भुगतना ही होगा. दक्ष के शाप को पलटा नहीं जा सकता.

देवताओं के आग्रह पर ब्रह्माजी ने देवताओं को एक उत्तम उपाय बताया. ब्रह्माजी बोले- दक्ष के शाप का प्रभाव समाप्त करने का सामर्थ्य महादेव के अतिरिक्त किसी के पास नहीं. चन्द्रमा देवताओं के साथ प्रभास क्षेत्र में चले जाएं.

वहां विधिपूर्वक मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए भगवान शिव की आराधना करें. शिवलिंग की स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें और भोलेनाथ को प्रसन्न करें तो क्षयरोग से मुक्ति होगी.

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ब्रह्माजी की आज्ञा से देवताओं और ऋषियों के संरक्षण में चन्द्रमा प्रभास क्षेत्र में गए और मृत्युंजय भगवान का अनुष्ठान प्रारम्भ किया. वह मृत्युंजय-मंत्र के जप से महादेव की उपासना में लीन हो गए.

ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की. दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित्त होकर निरन्तर खड़े रहे.

उनकी तपस्या से भगवान शंकर प्रसन्न हो गए. उन्होंने चन्द्रमा से कहा- इस कठोर तप की अभिलाषा बताओ. चन्द्रमा ने सभी अपराधों के लिए क्षमा और शरीर की क्षयरोग से मुक्ति का वरदान मांगा.

भगवान शिव ने कहा– चन्द्रदेव! तुम्हें जिसने शाप दिया है वह कोई साधारण पुरुष नहीं, प्रजापति दक्ष हैं. उनके शाप को पूरी तरह समाप्त करना उनका अपमान करना होगा.

परंतु मैं तुमपर प्रसन्न हूं. तुम्हें वरदान देता हूं कि क्षय रोग का प्रभाव हमेशा नहीं रहेगा. प्रतिदिन एक पक्ष में क्षय के कारण तुम्हारा शरीर क्षीण हुआ करेगा, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन वह निरन्तर सुंदर और स्वस्थ होकर बढ़ेगा. और लोक-सम्मान पुनः प्राप्त करोगे.

भगवान शिव की कृपा प्राप्तकर चन्द्रमा प्रसन्न हुए. उन्होंने महादेव की स्तुति की. चंद्रमा ने महादेव से प्रार्थना की- हे प्रभु जिस स्थान पर आपके दर्शन से मुझे क्षय रोग से मुक्ति मिली आप वहां स्थित हों.

महादेव ने चंद्रमा की प्रार्थना स्वीकार की और लिंग रूप में प्रभास क्षेत्र में स्थित हो गए. चन्द्रमा को यश प्रदान करने के महादेव ने उस ज्योतर्लिंग को ‘सोमेश्वर’ नाम दिया.

चंद्रमा पर कृपा के कारण सोमेश्वर ज्योतिर्लिंग ही सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध है. प्रभास क्षेत्र में सभी देवताओं ने मिलकर एक सोमकुण्ड की स्थापना की. सोमनाथ की उपासना से क्षय रोग से मुक्ति मिलती है.

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सोमकुण्ड में शिव तथा ब्रह्मा का निवास है. इस कारण यह पापनाशक-तीर्थ कहा जाता है. असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है. शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में कहा गया है-

चन्द्रकुण्डं प्रसिद्ध च पृथिव्यां पापनाशनम्।
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।
रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।
प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसं भवम्।
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।
सोमलिंग नरो दृष्टा सर्वपापात्प्रमुच्यते।
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।

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