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सठ सुधरहिं सतसंगति पाई।
पारस परस कुधात सुहाई॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं।
फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
भावार्थः दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण हो जाता है. दैवयोग से यदि कभी सज्जन भी कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहां भी सांप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं.
अर्थात सांप के साथ जीवनभऱ रहने वाली मणि अपना चमकने का स्वभाव नहीं त्यागती और न ही सांप के संसर्ग से वह विषैली होती है. उसी तरह साधु भी दुष्टों की संगति में आने पर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, स्वयं अवगुण नहीं स्वीकारते.
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी॥
सो मो सन कहि जात न कैसें।
साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥
भावार्थः ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पंडितों की वाणी भी संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है. उसका वर्णन करने में मेरा संकोच भी वैसा ही सहज है जैसे किसी साग-तरकारी बेचनेवाले को मणियों के गुण बताने में संकोच होता है.
दोहा-
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ 3 (क)॥
भावार्थः मैं संतों को प्रणाम करता हूं, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अंजलि में रखे हुए सुंदर फूल हाथों को सुशोभित करने में भेदभाव नहीं करते.
फूल उन हाथों को भी सुगंधित करते हैं जिसने उन्हें डाल से तोड़ लिया और उन हाथों में भी सुगंध छोड़ते हैं जिन हाथों में वे टूटने के बाद जाते हैं. वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं.
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥
भावार्थः संत सरल हृदय और जगत के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जानकर मैं विनय करता हूँ, मेरी इस बाल-विनय को सुनकर कृपा करके श्री रामजी के चरणों में मुझे प्रीति दें॥
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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