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मैं वरदान देता हूं कि आपकी इच्छा पूर्ण करने को स्वयं श्रीहरि अश्व के रूप में यहां आएंगे. आप इस स्वरूप में ही उनके जैसे एक पुत्र की माता बनेंगी. आपका पुत्र एकबीर के नाम से जगत प्रसिद्ध होगा. फिर आप श्रीहरि के साथ बैकुंठ चली जाएंगी.
लक्ष्मीजी की सारी मनोकामना पूरी करके शिवजी अंतर्धान हो गए. कैलाश पहुंचकर भोलेनाथ ने अपने गण चित्ररूप को विष्णुलोक भेजा. शिवगण ने जाकर विष्णुजी को शिवजी का संदेश कह सुनाया.
शिवजी का वरदान पूरा करने के लिए विष्णुजी को आना ही था. वह स्वयं एक दिव्य अश्व का रूप लेकर आए. उन्होंने लक्ष्मीजी के साथ संसर्ग किया. समय आने पर शिवजी के वरदान अनुसार दोनों के एक पुत्र हुआ.
पुत्र होने के बाद विष्णुजी ने कहा- देवी ययाति के वंश में हरिवर्मा नामक एक राजा हैं. पुत्र के रूप में मेरा अंश पाने के लिए वह सौ वर्षों से घोर तप कर रहे हैं. मैंने यह पुत्र उनके लिए ही उत्पन्न किया है.
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