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जब हनुमानजी को लगा कि शनिदेव समझने वाले नहीं तो उन्होंने शनिदेव से पूछा- आप मेरे शरीर के किस स्थान पर बैठने आ रहे हैं? गर्व में भरकर शनिदेव ने कहा कि आरंभ में मैं प्राणी के सिर पर स्थान लेता हूं और ढाई वर्ष तक उसकी बुद्धि विचलित बनाए रखता हूं.
मध्य के ढाई वर्ष उसके पेट में रहकर उसका स्वास्थ्य बिगाड़ता हूं. अंतिम ढाई वर्ष तक पैरों में प्रवेशकर उसे बहुत भटकाता हूं.’
शनिदेव हनुमानजी के मस्तक पर आ बैठे तो हनुमानजी को सिर में तेज खुजली महसूस हुई. खुजली मिटाने के लिए हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया. पर्वत के भार से शनिदेव चिल्लाने लगे. उन्होंने हनुमानजी से पूछा कि आप यह क्या कर रहे हैं. इससे पीड़ा हो रही है.
हनुमानजी ने उत्तर दिया- जैसे आप विधि के विधान से विवश हैं वैसे मैं अपने स्वभाव से विवश हूं. जब भी मेरे सिर में खुजली होती है मैं खाज मिटाने के लिए सिर पर कई पर्वत रख लेता हूं. इसलिए परेशानी क्या है, आप अपना कार्य करें, मैं अपना कार्य कर रहा हूं.
फिर हुनमानजी ने दूसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया.
भार से दबे शनिदेव ने हनुमानजी से अनुरोध किया- कृपया आप इन पर्वतों को उतारिए. मैं संधि को तैयार हूं. हनुमानजी ने अनसुना करते हुए तीसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया. शनिदेव चिल्लाकर विनती करने लगे- हनुमानजी मैं वचन देता हूं, कभी भी पास नहीं फटकूंगा.
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