[sc:fb]
पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमानजी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.
चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.
चित्रसेना हनुमानजी को श्राप देने ही जा हे रही थी कि श्रीराम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इसलिए हनुमानजी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.
क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्रीराम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्रीकृष्ण अवतार लूंगा तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.
शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.