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जामवंतजी निर्विघ्न रावण के राजदरबार के द्वार तक पहुंच गए. रावण स्वयं उनकी अगवानी करने बाहर आया. रावण को अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्तजी ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं श्रीराम का दूत बनकर आया हूं. उन्होंने तुम्हें सादर अभिवादन भेजा है.
रावण ने जामवंतजी से कहा- आप हमारे पितामह के भाई हैं. इस नाते आप हमारे पूज्य हैं. आप कृपया आसन ग्रहण करें. जामवन्तजी ने आसन ग्रहण किया और बोले वनवासी श्रीराम ने तुम्हें प्रणाम कहा है. सागर पर सेतु बांध लेने के बाद अब महेश्वर लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं.
इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचार्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है. मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूं.
रावण मुस्कुराने लगा फिर पूछा- क्या राम द्वारा महेश्वर-लिंग-विग्रह स्थापना लंकाविजय की कामना से किया जा रहा है? जामवंतजी ने हामी भरी.
वहां मौजूद प्रहस्त आंखे तरेरते हुए गुर्राया– राम अत्यंत धूर्त और निर्लज्ज है. लंकेश्वर ऐसा प्रस्ताव स्वीकार नहीं करेंगे.
लंकेश ने प्रहस्त को चुप कराया. उसने कहा-जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना और आचार्य बनने योग्य जाना है. क्या रावण महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार करके मूर्ख नाम से जाना जाए.
जब वनवासी राम ने इतना बड़े आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं इसकी मुझे भी जांच करनी होगी. जामवंतजी यदि हम आपको यहां बंदी बना लें और आपको लौटने न दें तो आप क्या करेंगे?
जामवंत खुलकर हंसे और बोले- लंका के समस्त दानवों में इतनी शक्ति नहीं कि वे मिलकर भी मुझे बंदी बना लें. मुझे अपनी शक्ति का परिचय कराने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता.
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aage ki ek katha me to aap ne kaha tha ki baluka sivling ki stapna lanka vijaya ke bad sitaji k hato hui thi
ye dono kathao ka bhed samjane ki krupa kare
अति सुन्दर
आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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