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हे पार्वती, शापमुक्ति में अभी देर है. अभी तो वररुचि का कानभूति से मिलना बाकी है फिर सुप्रतिष्ठित नगर में गुणाढ्य नाम से रह रहे माल्यवान को भी तो कानभूति से मिलना है और यह कथा न सिर्फ सुननी है बल्कि उसका प्रचार भी करना है.
वररुचि मां विंध्यवासिनी का बड़ा भक्त था. उसे मां विंध्यावासिनी ने सपने में आकर कहा कि वररुचि तूं विंध्य के जंगलों में जा वहां तुझे कानभूति नामक एक पिशाच मिलेगा. उससे मिलन तुम्हारे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना होगी.
वररुचि ने इसे मां का आदेश समझा और विंध्य के पर्वतों और जंगलों की ओर अकेले ही निकल पड़ा. घने जंगलों से गुजरता और खूंखार जानवरों से बचता, बचाता आखिर वह उस जगह पहुंच ही गया.
कानभूति यहां एक विशाल बरगद के नीचे अनेक पिशाचों से घिरा हुआ बैठा था. वररुचि ने पिशाचों के बीच उसे निडर बैठा देखकर अंदाजा लगा लिया कि यही कानभूति होगा.
कुशलक्षेम के बाद वररुचि ने कहा- यह बताओ कि तुम इस खतरनाक निर्जन बियावान में इस तरह क्यों रहते हो? कानभूति बोला- मुझे सही-सही तो नहीं पता पर एक सुनी-सुनायी बात बताता हूं.
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Good
mujhye vagwan ke kahani aacha lagtahen