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भगवान ने छोटे बटुक का रूप धरा था. जब वह बली की यज्ञशाला में प्रवेश कर ही रहे थे कि वहां आतिथ्य सेवा में लगी बली की पुत्री रत्नमाला की दृष्टि उनपर पड़ी.

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भगवान का बालक रूप इतना मनमोहक था कि रत्नमाला के मन में इच्छा हुई कि काश इस बालक को मैंने अपना दूध पिलाकर पाला होता तो आज इसका सलोना रूप देखकर मुझे कितनी प्रसन्नता होती. ईश्वर अभी कुछ वरदान मांगने को कहें तो मैं यही मांग लूं.

रत्नमाला ऐसे विचारों में ही खोई थी. यह सोचते-सोचते ही रत्नमाला के स्तनों से दूध उतर आया पर भगवान उस समय दूधमुंहे स्वरूप में नहीं थे अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना संभव नहीं था.

भगवान अपनी लीला करने आए थे. तीन पग में उन्होंने बली का सर्वस्व दान में मांगकर उसे सुतल लोक भेज दिया और अगले कल्प में इंद्रपद दे दिया.

भगवान ने जब बली के मस्तक पर पांव रखे तो यह देखकर रत्नमाला के क्रोध की सीमाएं पार कर गईं. वह कुछ पल पूर्व उन्हें दूध पिलाने की सोच रही थी तभी उसे भाव आया कि ऐसी संतान को अपना दूध पिलाकर बड़ा करने के स्थान पर तो मैं दूध में विष देकर मार ही देती.

यह सब तब उस समय सोच रही थी जब भगवान बली और उसके परिजनों पर अपनी कृपावृष्टि कर रहे थे. भगवान ने रत्नमाला के मन में उमड़ी यह इच्छा भी पूरी करने का वचन दे दिया.

तब से रत्नमाला भगवान की कृपा की प्रतीक्षा कर रही थी. प्रभु ने उसकी अभिलाषा पूर्ण कर दी.

पूतना के शरीर का सारा अवगुण सोखकर पवित्र करके मोक्ष प्रदान किया. गोकुल के लोगों ने चिता बनाई और उसके शरीर के कई टुकड़े करके जलाया क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं अतृप्त आत्मा उन्हें पीड़ित न करे.

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