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पहले तो इस क्रूर श्राप का समाचार को सुनकर देवतागण चिंतित हुए पर फिर सबकी राय बनी कि सांप न केवल लगातार बढते जा रहे हैं और किसी को भी डस लेते हैं सो श्राप बहुत अनुचित नहीं. उन्होंने कद्रू के श्राप को निरस्त नहीं किया.

कद्रू ने बेटों के बात न मानने पर पूरी योजना चौपट होने की आशंका में रात बिताई. दूसरे दिन भोर में ही घोड़े को निकट से देखने चलीं. उधर सर्पों ने आपस में विचार कर तय किया कि हमें माता की आज्ञा का पालन करना चाहिए.

यदि उसके मन का न हुआ तो हमें जला देगी. अगर इच्छा पूरी हो गयी तो हो सकता है प्रसन्न हो शाप से मुक्त कर दे. इसलिए चलो, समुद्र पार चल कर घोड़े की पूंछ काली कर ही दें.

वे घोड़े की पूंछ से बाल बनकर लिपट गए जिससे वह काली दिखने लगी. इधर कद्रू और विनता ने घोड़े के पास पहुंचकर देखा कि घोड़े का शरीर तो उज्जवल है पर पूंछ काली है. यह देखकर विनता उदास हो गई. कद्रू ने उसे अपनी दासी बना लिया.

(विनता के दूसरे अंडे का क्या हुआ. पुत्र के शाप के कारण मिली दासता से कैसे हुई मुक्ति यह कथा अगली पोस्ट में)

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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