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शिवलिंग तथा उस पर उसके ही द्वारा चढ़ाई पूजन-सामग्री को देखते ही बालक उठ खड़ा हुआ. उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था. उसने शिवजी की स्तुति कीं. बार-बार अपने मस्तक को उनके चरणों में लगाया.
सूर्यास्त होने पर वह शिवालय से निकल कर बाहर आया और अपने घर को देखने लगा. उसका घर इन्द्र के महल जैसा शोभा पा रहा था.
बेटे से शिव की कृपा का सम्पूर्ण वर्णन सुनकर ग्वालिन ने राजा चन्द्रसेन को सूचित किया. महादेव का पूजन पूर्ण करके चन्द्रसेन रात्रि के समय पहुंचे और ग्वालिन के पुत्र का प्रभाव देख चकित हो गए.
उज्जयिनि को घेरकर युद्ध के लिए खड़े राजाओं ने भी गुप्तचरों के मुख से वह अद्भुत वृतांत सुना तो विचार किया कि चन्द्रसेन महान शिवभक्त है. इसलिए उसे जीतना असंभव है.
महाकाल स्वयं उज्जयिनी का पोषण करते हैं. यहां का बालक भी ऐसा शिवभक्त है, तो चन्द्रसेन का शिवभक्त होना स्वाभाविक है. ऐसे नगर पर आक्रमण से महादेव क्रोधित हो जाएंगे.
इस भय से उन्होंने दुश्मनी का विचार त्यागकर संधि प्रस्ताव भेजा ताकि उन्हें भी भगवान महेश्वर की कृपा प्राप्त होगी. उसी समय परम तेजस्वी श्री हनुमानजी वहां प्रकट हो गए.
उन्होंने बालक को हृदय से लगाकर राजाओं से कहा- ध्यानपूर्वक सुनो. शरीरधारियों के लिए महादेव से बढ़कर अन्य कोई गति नहीं है. महेश्वर की कृपा-प्राप्ति ही मोक्ष का उत्तम साधन है.
इस गोप कुमार ने शिवलिंग के दर्शन किए और उससे प्रेरणा लेकर स्वयं शिवपूजा में प्रवृत्त हुआ. यह कोई लौकिक या वैदिक मन्त्र नहीं जानता, किन्तु इसने बिना मन्त्रोच्चार के भक्ति निष्ठा के बल से भोलेनाथ की आराधना की और उन्हें प्राप्त कर लिया.
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